बुधवार, 25 नवंबर 2009

मेरे देश की जाँच एजेंसियाँ


मेरे घर के आस-पास कुछ औरतें अर्थात आँटियां रहती है। जिनका एक ही काम है। कौन किसके घर में आ-जा रहा है, किसके घर में क्या नया समान आया है, कौन क्या कर रहा है अर्थात अपने आस-पङोस की हर हलचल का इन्हें पता होता है। और हाँ, खुद की बुराईयों पर पर्दा डालना ये औरतें कभी नहीं भूलती।
ऐसा ही कुछ हाल हमारी खूफिया एजेंसियों का भी है। अमरीका जाने से पहले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं ने एक बयान में कहा था कि उन्हें आए दिन भारत की खूफिया जाँच एजेंसियों से यह सूचनाएँ मिल रही है कि पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी भारत में 26/11 जैसा एक और हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। यह खबरें प्रधानमंत्री को उन्हीं खूफिया एजेंसियों से मिली है जो 26/11 के हमले के बारे में कुछ भी बताने में नाकाम रही थी। यही नहीं, 26/11 की साजिश रचने वाले तव्वहुर राणा और डेविड हेडली नकली पासपोर्ट पर भारत भ्रमण करते रहे, दोस्त बनाते रहे और एक दिन भारत को दहला कर चले गए। मगर तब भी हमारी यही खूफिया एजेंसीयाँ घोङे बेच कर सोती रही। वह तो भला हो अमरीका की जाँच एजेंसी एफ.बी.आई का जिसने 26/11 की जाँच को फिर से नई दिशा दी वरना इस हादसे की पहली बरसी पर भी हमारी जाँच एजेंसियाँ कसाब को लेकर घिसतटी रहती और जाँच चितंबरम द्वारा पाकिस्तान पर आरोप लगाने और पाकिस्तान द्वारा उनको खारिज करने पर अटकी रहती।
भारत की जाँच एजेंसियों में शुरू से ही तालमेल की कमी रही है। जब कोई हादसा हो जाता हे तो एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाती है और फिर जाँच शुरू की जाती है। तब लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं होता। भारतीय जाँच एजेंसियाँ अभी तक भारत में हुए ज़्यादातर बम धमाकों की जाँच ही कर रही है। दोषियों को सज़ा दिलाना तो दूर की बात है। वैसे भारत की अपनी तरह की पहली जाँच एजेंसियाँ है जिसे दूसरे देश में हो रही हर हरकत की जानकारी है मगर खुद के देश में क्या हो रहा है, उन्हें दूसरे देश की जाँच एजेंसियों से पता चलता है।
वैसे प्रधानमंत्री की बात पर यकीन करने का मन तो नहीं करता मगर जब पङोस में रहने वाली औरतों का ख्याल आता है तो यकीन न करने की कोई गुंजाईश भी नहीं रहती।

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

लुट गयी ये ज़मीं, लुट गया आसमां

कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कभी नहीं भरते हैं। वक़्त इन घावों पर मरहम लगाकर इनकी टीस कुछ कम करने की कोशिश जरूर करता है लेकिन दर्द की स्मृतियों को भुला पाना क्या इतना आसन होता है? भारत-पाकिस्तान विभाजन का घाव तो पूरे देश को मालूम है लेकिन इस घाव का असली दर्द तो इनको झेलने वाले ही जानते हैं। शायद इसी दर्द को बयां करती है असगर वजाहत द्वारा लिखित नाटक "जिस लाहौर नई देख्या ओ जम्या ही नई"।

असगर वजाहत लिखित इस नाटक के बीस साल पूरे होने पर श्रीराम सेंटर में इसका विशेष प्रदर्शन किया गया। गौरतलब है की आज से बीस साल पहले हबीब तनवीर ने इसी रंगमंडल के साथ इस नाटक को पहली बार मंचित किया था। यह नाटक एक उर्दू पत्रकार के यात्रा संस्मरण से प्रेरित है जिसमें भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय लाहौर में अकेली बच गयी एक हिन्दू बुढ़िया की दास्तान है। विभाजन और अपनी जमीन से अलग होने का दर्द नाटक के केंद्रबिंदु हैं और धर्म, उन्माद, और भाईचारे का धीरे-धीरे अंकुरित होता बीज इसके आसपास घूमते अनेक ध्रुव। वैसे ध्रुव जिनका मिलन कहीं सुखद है तो कहीं अत्यंत दुखद। यह केंद्रबिंदु और इसके विभिन्न ध्रुवों को मिलाकर एक ऐसी कथा का निर्माण होता जो इतिहास के संभवतः सबसे बड़े विस्थापन का जीवंत चित्र उकेरने में कामयाब होती है।

विभाजन पर चाहे 'कितने पाकिस्तान', 'गर्म हवा', 'पिंजर' या फिर 'तमस' किसी की बात की जाए तो फिर भी 'जिस लाहौर नई देख्या' को देखने का अपना अलग ही अनुभव है। माई की भूमिका में शोभा वर्मा, पहलवान के अभिनय में अतुल जस्सी और नासिर काज़मी के चढ़ते -उतरते संवादों और अभिनय के जरिये आप लगभग दो घंटे तक बिलकुल मंत्रमुग्ध से बैठे रहेंगे। कहानी में मानवीय संवेदनाओं, धर्म की अधूरी समझ के कारण उपजी धर्मान्धता और अपने मूल जड़ से कटने की व्यथा को चंद घंटों में बांधने में यह नाटक बिलकुल सफल हुआ है। नासिर काज़मी के हालात के अनुसार नाटक में बोले गए शेर मानवीय अंतर्द्वंद के कई अनछुए पहलुओं को बड़ी खूबसूरती के साथ तराशकर बाहर निकालते हैं। विषय पूरी तरह गंभीर है लेकिन कहीं-कहीं हास्य रस वातावरण को बोझिल होने से बचाता है।

यह नाटक वर्तमान सन्दर्भ में हमसे कई सवाल पूछता हुआ सा मालूम पड़ता है। मसलन, क्या धर्म के आगे मानवता की तिलांजलि देना उचित है। अलग-अलग धर्म क्या सिर्फ उसी एक महान सत्ता को नहीं मानते जो अमूर्त है। अपने मूल जड़ों से कटकर क्या आदमी ज्यों का त्यों बना रह सकता है और सबसे अहम् सवाल की क्या विभाजन की त्रासदी को भूलकर हम मिलकर नहीं रह सकते और सभी धर्मों से बढ़कर क्या कोई ऐसा धर्म नहीं है जिसमे सभी बराबर हो। हाँ एक धर्म ऐसा है, और वो है मानवता का धर्म। चलते-चलते एक गाना याद आ रहा है " पंछी नदियाँ पवन के झोकें, कोई सरहद ना इन्हे रोके"।

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

पहले पैमाना तो निर्धारित करें कपिल सिब्बल

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठने के लिए बारहवीं कक्षा में कम से कम 80 प्रतिशत अंक लाने की बात कहकर एक नई बहस को जन्म दिया है। हालांकि अपनी कही बात पर इतनी तीखी प्रतिक्रियाएँ आने पर उन्होने झट से सफाई भी पेश कर दिया। अपनी बात को बदलते हुए उन्होनें कहा है कि विशेषज्ञों की समीति अच्छी तरह विचार करने के बाद यह तय करेगी कि न्यूनतम अंक क्या होंगे? कपिल सिब्बल के अनुसार ऐसा करने से छात्र 12वीं की बोर्ड परीक्षा को गंभीरता से लेंगे और आईआईटी के साथ अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कोचिंग संस्थानों पर अंकुश लगेगा । विद्यार्थियों को नंबरों की अंधी दौड़ से बचाने के लिए दसवीं में ग्रेडिंग सिस्टम लाए जाने पर तमाम तरह के तर्क दिए गए थे और इस कदम पर वाहवाही भी लूटी गई थी पर आईआईटी प्रवेश परीक्षा के मामले में वो सारी बातें क्यों भुला दी गईं? एक तरफ तो हम 10वीं के छात्रों को नंबरों की अंधी दौड़ से बचाना चाहते हैं, दूसरी तरफ 12वीं के छात्रों को इसी दौड़ में क्यों झोंक रहे हैं? देश भर में इसके विरोध में स्वर उठने लगे हैं, खासतौर से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के छात्र और शिक्षा से जुड़े लोग इस प्रस्ताव से आगबबूला हैं।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 80 प्रतिशत या इससे अधिक अंक लाने वाले विद्यार्थियों को उंगलियों पर गिना जा सकता है क्योंकि इन राज्यों में 12वीं की परीक्षा का स्तर बहुत कठिन होता है और 12वीं के साथ 11वीं के प्रश्न भी पूछे जाते हैं। दूसरी तरफ सीबीएसई में थोक के भाव में 80 प्रतिशत से ऊपर अंक लाने वाले छात्र मिल जाते हैं । वैसे भी जब देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग बोर्ड हैं और पाठ्यक्रम में भी आकाश और पाताल का अंतर है तब 80 प्रतिशत अंकों का ऐसा फरमान थोपना समझदारी तो नहीं ही कही जा सकती है। इन बे सिर-पैर की बातों और अंकों की इस अँधी दौर में गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थि पीछे छूटते जाएँगे और उनकी प्रतिभा का कोई मोल नहीं रह जाएगा।
सरकार आईआईटी और इसी स्तर के सभी केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्ग के छात्रों को आरक्षण देती है मगर 80 प्रतिशत अंकों की बाध्यता का प्रभाव क्या उन लोगों पर नहीं पड़ेगा? लाखों विद्यार्थियों का आईआईटी में जाने का सपना चकनाचूर हो जाएगा। ऐसे विद्यार्थि जिनके पास अपनी कड़ी मेहनत के अलावा न तो सीबीएसई बोर्ड जैसी चमक-धमक होती है और ना ही उतनी सुविधाएँ। अगर विद्यार्थि इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य पेशेवर शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए कोचिंग संस्थानों की शरण में जाते हैं तो यह शिक्षा व्यवस्था की खामी का परिणाम है। आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की गुणवत्ता को बनाए रखना जरूरी है मगर साथ ही यह सुनिश्चित करना भी सरकार का ही दायित्व है कि इसमें प्रवेश पाने वाले समाज के सभी वर्गो से हों। किसी एक परीक्षा के आधार पर योग्यता को मापना उचित नहीं है।
अगर इस तरह का कोई काम करना भी है तो इसे निष्पक्ष रूप से तभी किया जा सकता है जब सभी राज्यों में एक ही बोर्ड हो उनके पाठ्यक्रम में समानता हो और शिक्षा में बराबरी हो । तभी ऐसी शर्त को उचित ठहराया जा सकता है वरना तो इससे एक साजिश की बू आती रहेगी जहाँ विकास से वंचित और पिछड़े तबके को और पीछे धकेलने की तैयारियाँ चल रही है।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

एम्स बन गया है विदेशी मरीजों का डॉक्टर


अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान यानि ‘एम्स’ भारत में स्वास्थय जगत का सबसे प्रतिस्ठित नाम है। यहाँ डॉक्टरी की शिक्षा में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों पर सरकार लगभग 98 लाख से लेकर 170 लाख तक खर्च करती है लेकिन ये पैसा भारत से ज्यादा विदेशी मरीजों की सेवा में लग रहा है। एक सर्वे के अनुसार इस संस्थान से डॉक्टर बनकर निकलने वालों में से 54 प्रतिशत विदेशी मरीजों की नब्ज देखना पसंद करते हैं।
लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में केंद्रीय स्वास्थय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने यहाँ विद्यार्थियों पर हो रहे खर्च का ब्योरा तो दिया मगर यहाँ डॉक्टरों में बढ़ी विदेशी पसंद पर कुछ भी नही कहा। भारतीय छात्रों के प्रतिभा पलायन का ये कोई इकलौता उदाहरण नही है। चाहे वो इंजीनियरिंग के छात्र हों या डॉक्टरी के, भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों से शिक्षा लेकर ये लोग विदेश का रूख करना पसंद करने लगे हैं। इस बात की दुहाई दी जाती है कि भारत में प्रतिभावान इंजीनियारों, वैज्ञानिकों, डाक्टरों आदि को उनकी योग्यता के अनुकूल काम करने की सुविधाएँ और स्थितियाँ नहीं मिलतीं, लिहाजा वे विदेशों की ओर रूख करने को बाध्य होते हैं। लेकिन ये सच्चाई का एक ही पहलु है, ये लोग अधिक से अधिक सुख-सुविधाओं की खोज में विदेशी बनकर रहना पसंद करते हैं।
विश्व स्वास्थय संगठनके अनुसार 100 लोगों की जनसंख्या पर एक डॉक्टर होना चाहिए मगर हमारे देश में ये अनुपात दस हजार पर एक डॉक्टर का है। एक तो देश में अच्छे अस्पतालों के अभाव के कारण एम्स जैसे संस्थानों में मरीजों की इतनी मारामारी होती है कि दूर-दराज से आए लोगों को कई दिनों तक खुले आसमान को ही छत बनाना पड़ता है ऊपर से डॉक्टरों की कमी से इनपर दोहरी मार पड़ती है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सरकार जब यहाँ इतना पैसा बहाती है तो वो यहाँ की जनता के काम क्यों नहीं आता? इससे बड़ा सवाल ये है कि क्यों नहीं देश के तमाम भागों में ऐसे संस्थान बनाए जाते हैं ताकि इन संस्थानों पर इतना बोझ ही ना पड़े? इसके अलावा ऐसे मानदंड भी बनाए जाने की जरूरत है जिससे इन लोगों के पलायन पर रोक लगाई जा सके। जब देश का इतना पैसा इनकी पढ़ाई पर खर्च होता है तो इन्हें भी अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

कई खामियों की शिकार है आईआईएमसी लाइब्रेरी

एशिया भर में मॉस कम्युनिकेशन के लिए सबसे बड़ी लाइब्रेरी का तमगा हासिल करने वाली आईआईएमसी( इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन) की लाइब्रेरी कई खामियों से ग्रसित है। अव्यवस्था का आलम यह है की यहाँ पिछले सात साल से लाईब्ररियन का पद ही खाली पड़ा है। वैसे तो संस्थान की लाइब्रेरी में और भी कई खामियां हैं लेकिन यह समस्या बहुत ही बड़ी है। ऐसा अगर चंद दिनों या महीनों से होता तो कोई बात नहीं थी लेकिन सात साल तक एक प्रीमिअर संस्थान में( जिस संस्थान को सूचना और प्रसारण मंत्रालय चलाता हो उसमें) इस तरह की बात सामान्य नहीं कही जा सकती है। तिस पर संस्थान का प्रशासन कान में तेल डाले पड़ा हुआ है और संस्थान के सभी संकायों के शिक्षक इसपर बात करने से साफ़ मना कर देते हैं। उनका कहना है की इस मुद्दे पर हम कुछ नहीं कर सकते और ना ही कोई कमेन्ट देंगे। सारा काम प्रशासन के ज़िम्मे है। अब यह क्या माज़रा है की जिस संस्थान को सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा लाखों की फंडिंग मिलती हो और जिसके बारे में यह कहा जाता है की यहाँ हर छात्र पर 3-4 लाख रुपये(10 महीने में) का खर्चा आता है वहां एक अदद लाईब्ररियन की नियुक्ति नहीं हो रही है।

छात्रों से बात करने पर लाइब्रेरी की और कई खामियों के बारे में पता चलता है। मसलन, शेल्फ में रखी किताबों का अस्त-व्यस्त होना, हिंदी पत्रकारिता के लिए कम किताबें, साहित्य के किताबों की कमी, क्लास और लाइब्रेरी के खुलने-बंद होने के समय में टकराव आदि अनेक परेशानियाँ हैं। जब मैंने लाइब्रेरी के एक कर्मचारी राजबीर सिंह डागर से इन मुद्दों पर बातचीत की तो वो कई बातों को टाल गए। काफी सारी बातों के लिए उन्होंने छात्रों को हो ज़िम्मेवार ठहराया। कहा की वे ही किताबें इधर-उधर कर देते हैं। कुछ लोग ऐसा अपनी मनपसंद किताब को छुपाने के लिए भी करते हैं। कई शेल्फों पर स्टिक्कर नहीं लगे होने पर उन्होंने कहा की आगे से इसपर धयान दिया जायेगा।

छात्र कई दिनों से लाइब्रेरी से संबंधित मुद्दे को उठा रहे हैं लेकिन महीनों गुज़र जाने के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं दिखाई दे रहा है। संस्थान को चाहिए की वो अपने नाम और जर्नलिज्म के लिए नंबर एक होने के ब्रांड के साथ न्याय करते हुए लाइब्रेरी को जल्द से जल्द दुरुस्त करे।

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

मीरा, दिनकर, ग़ालिब, बच्चन और बिस्मिल नज़र आए एक मंच पर!!


शशि भूषण : कल्पना कीजिए एक ऐसे मंच की जहाँ दिनकर, ग़ालिब, मीराबाई और बच्चन एक साथ अपनी कविताएँ प्रस्तुत करते दिखाई दें। सोच कर ये भले ही असंभव सा लगे मगर ऐसे ही माहौल को बिलकुल जीवंत बना दिया भारतीय जन संचार संस्थान के हिन्दी पत्रकारिता विभाग के छात्र-छात्राओं ने। इन लोगों ने अलग-अलग समय के इन विभूतियों को एक साथ एक ही मंच पर ला खड़ा किया।
मौका था संस्थान में हिन्दी पखवाड़ा के समापन समारोह का और कार्यक्रम का नाम था ‘कवि दरबार’। कार्यक्रम में हिन्दी पत्रकारिता के नौ छात्र-छात्राओं देश के महान कवियों की कविताओं को प्रस्तुत किया। हू-ब-हू इन महान कवियों जैसी वेश-भूषा और हाव भाव के साथ प्रस्तुत किए गए इस कार्यक्रम ने सभी लोगों को मंत्रमुग्ध सा कर दिया। वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के चेहरे पर प्रशंसा के भाव नज़र आ रहे थे। रामधारि सिंह दिनकर, राम प्रसाद बिस्मिल, मिर्ज़ा ग़ालिब, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, विधापति, मीराबाई, फ़राज़ अहमद और माखनलाल चर्तुवेदी की कविताओं ने माहौल को कविमय बना दिया। सबसे ज़्यादा प्रभावित किया राम प्रसाद बिस्मिल बने अमिश कुमार रॉय ने । उनकी कविता की हर पंक्ति के साथ हॉल इन्क़लाब जिन्दाबाद के नारों से गूँज उठता था । दूसरी तरफ मधुशाला के प्याले ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्तियों से फूट रहे ओज ने एक नए जोश का संचार किया।
आज की युवा पीढी में जहाँ कविताओं और कहानियों के प्रति रुझान कम होता जा रहा है वहीं हिन्दी पत्रकारिता के इन छात्रों ने ये साबित कर दिखाया की ऐसे युवा भी हैं जो ना हिन्दी को भूले हैं और ना इससे जुड़े लोगों को।

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

दया नहीं समाज में सम्मान चाहिए


एक साल पहले तक नागालैंड की अचुंग्ला भी उन मेधावी विधार्थियों में थी जो कड़ी मेहनत के बाद डॉक्टरी की शिक्षा में प्रवेश पाते हैं। दिल में ऊँचे ख़्वाब और डॉक्टर बन लोगों की सेवा करने के भाव से भरी थी अचुंगला। दिमागी बुखार(मेनिनजाइटिस) की गिरफ्त में आने से पहले वो भी समाज की मुख्यधारा से उसी तरह जुड़ी थी जैसे हम सब आज जुड़े हैं। इस बिमारी की वजह से उसकी सुनने की शक्ति जाती रही और वो भी उन लोगों की श्रेणी में आ गइ जिन्हें हमारा समाज मूक-बधिर कहकर बेगाना बना देता है।
ये कहानी सिर्फ अचुंग्ला की नहीं है ये कहानी है देश के उन तमाम लोगों की जो हमारे समाज में अलग-थलग सा महसूस करते हैं। वे हमसे थोड़ा अलग हैं। वे बोल और सुन नहीं सकते हैं। उनकी खुशी और गम चेहरे के भाव से पता चलती है। आजादी के 60 साल बाद भी हम उनकी शिक्षा का पुख्ता प्रबंध नहीं कर पाए, वह आज भी हमसे मदद की उम्मीद रखते हैं। उन्हें शिक्षा व शिक्षक का महत्व पता है। हम बात कर रहे हैं मूक-बधिर बच्चों की। हमारे शिक्षा सिस्टम में मिडिल के बाद मूक-बधिर बच्चों के लिए न तो शिक्षा संस्थान मिलते हैं और न ही 'स्पेशल टीचर।' इन लोगों को ना तो आम लोगों के साथ कॉलेजों में पढने-लिखने की सुविधा मिलती है और ना ही इन्हें सामान्य ज़िन्दगी नसीब हो पाती है, मगर निराशा के इस अंधकार में रोशनी की कुछ किरनें उजाला करने की कोशिश में लगी हैं।
दिल्ली के अरूना आसफ अली मार्ग पर स्थित ‘ऑल इन्डिया फेडरेशन ऑफ द डेफ’ ऐसी ही एक संस्था है। सन् 1955 से यह संस्था एक मिशन की तरह समाज से बहिष्कृत इन लोगों के हौसले बुलंद करने का काम कर रही है। इस संस्था के वरिष्ठ शिक्षक राजकुमार झा बताते हैं कि ये संस्था एक एन.जी.ओ है और भारत सरकार इसे फंड भी देती है। संस्था में इन बच्चों को उनकी रूचि के मुताबिक कई ऐसी कलाएँ सिखायी जाती हैं जिनसे वो खुद पर निर्भर हो सकें। फोटोग्राफी, डॉटा-इन्ट्री, सिलाई जैसी रोजगार देने वाली कलाओं में इन्हें ट्रेंड किया जाता है। यहाँ लड़के और लड़कियों के लिये छात्रावास की सुविधा भी दी जाती है। यहाँ प्रवेश की योग्यता आठवीं पास है और छात्रों से हर महीने 1130रूपये लिए जाते हैं जिसमें उन्हें रहने और खाने की सुविधा भी दी जाती है। राजकुमार झा बताते हैं कि इन बातों के अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण काम यहाँ किया जाता है वो है इन लोगों के मनोबल को बढाना। अचुंग्ला भी आज यहाँ फोटोग्राफी सीख रही है और अपने टूटे हुए मनोबल को वापस लाने की कोशिश कर रही है, मगर अलग होने का दर्द उसकी आँखों में साफ दिखता है। यहाँ जो बच्चे आते हैं उनके परिवार वाले उन्हें बोझ समझते हैं और बस पैसे देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। इस बात की चिंता किसी को नहीं होती कि इनके अकेलेपन को कैसे दूर किया जाए।
बजाए इसके की इन लोगों को समाज कि मुख्यधारा से जोड़ा जाए हर कोई बस पैसे देकर छुटकारा पाना चाहता है, चाहे वो हमारी सरकार हो या फिर इन लोगों के परिवार। बसों में या और जगहों पर लोग इन्हें ऐस देखते हैं मानो ये किसी और दुनिया से आए हैं। क्या हमारी संवेदना इस हद तक मर चुकी है कि हम उन लोगों को अपने साथ भी नहीं खड़ा कर सकते जो अपने हर पल में संघर्ष की एक मिसाल कायम करते हैं? क्या इंसानियत और पैसा तराजु पर बराबर हो चुके हैं? अगर नहीं, तो गली बार जब अचुंग्ला जैसे लोगों से मिलें तो उन्हें दया नही सम्मान की दृष्टि से देखें।

सोमवार, 28 सितंबर 2009

भाषा के साथ संस्कार भी बदलते हैं: राहुल देव


नई दिल्ली, 24सितंबर: भारतीय जन संचार संस्थान में ‘हिन्दी का भविष्य बनाम भविष्य की हिन्दी’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में देश के जाने-माने संपादकों ने अपने विचार रखे। सी.एन.ई.बी न्यूज़ चैनल के सीईओ और प्रधान संपादक राहुल देव, नई दुनिया के राष्ट्रीय संपादक मधुसूदन आनंद, दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग और आज़तक के समाचार निदेशक क़मर वहीद नक़वी इस मौके पर उपस्थित थे। हिन्दी के भविष्य को लेकर इनमें से कुछ चिंतित थे तो कुछ उम्मीदों से भरे हुए दिखे। संगोष्ठी की अध्यक्षता संस्थान के वरिष्ठ शिक्षक प्रो.के.एम.श्रीवास्तव ने की और संचालन हिन्दी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ.आनंद प्रधान ने किया।
बीज वक्तय रखते हुए सी.एन.ई.बी न्यूज़ चैनल के सीईओ और प्रधान संपादक राहुल देव ने ख़तरे की घंटी बजाई। उनका कहना था कि अगर हिन्दी की यही हालत रही तो 2050 तक भारत लिखाइ और पढाई के सारे गंभीर काम अंग्रेज़ी में कर रहा होगा और हिन्दी सिर्फ मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी। उन्होनें कहा कि किसी भी भाषा के बदलने से उस भाषा को बोलने वालों के संस्कार भी बदलते हैं। राहुल देव की बात को निराशाजनक बताते हुए नई दुनिया के राष्ट्रीय संपादक मधुसूदन आनंद ने कहा कि बदलते समय और तकनीक के साथ हिन्दी को भीबदलना ही होगा वरना इसे खत्म होने से कोई नही बचा पाएगा। उन्होने कहा कि अगर अंग्रेज़ी के कुछ शब्द हिन्दी में आ रहे हैं तो उन्हें रोकना नही चाहिए।
इस अवसर पर दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि भविष्य में वही हिन्दी चलेगी जो सरल होगी और आसानी से समझ में आने वाली होगी। उन्होनें कहा कि अंग्रेज़ी के शब्दों के आने से उसका वर्चस्व नहीं हो पाएगा बल्कि उससे हिन्दी और समृद्ध होगी। भविष्य की हिन्दी पर अपने विचार रखते हुए आज़तक के समाचार निदेशक क़मर वहीद नक़वी ने कहा कि भाषा में बदलाव और शब्दों का लेनदेन स्वभाविक है। उन्होनें इस बात को एक हद तक सही बताते हुए कहा कि भाषा का बदलाव ऐसा नही होना चाहिए कि उसके संस्कार ही खत्म हो जाए। उन्होनें कहा कि भाषा को पानी की तरह होना चाहिए, उसे जिस बरतन में रखा जाए उसी का रूप ले ले। संगोष्ठी का समापन प्रश्नकाल के साथ हुआ जिसमें इन संपादकों ने संस्थान के विधार्थियों के प्रश्नों के उत्तर दिए।

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

क्यों हैं हमारी सरकारें ऐसी ?

हमारे सामने यह महत्वपूर्ण प्रश्न हैं की आखिर हमारी सरकारे ऐसी क्यो हैं ? सरकार की नीद हमेशा तब क्यों खुलती है, जब पानी सर के ऊपर से निकलने लगता है। मुद्दे तो बहुत हैं जब सरकार का ऐसा रवैया रहा है। लेकिन यहाँ मैं सिर्फ चीन के साथ सीमा विवाद से संबंधित मुद्दे की बात कर रहा हूँ, जो कि अभी सुर्खियों में हैं।
1962 से पहले भारत चीन को अपना अच्छा पड़ोसी और अच्छा मित्र मानता था और भारत – चीन सीमा पर “ हिंदी-चीनी भाई-भाई ” के स्वर गूँजा करते थे। लेकिन 1962 के युद्ध के बाद ये भाई-भाई वाली धारणा समाप्त हों गई और चीन भारत का सबसे बड़ा शत्रु बनकर उभरा। लेकिन फिर प्रश्न यह उठता हैं कि, 1962 के युद्ध को युद्ध कहा जाए या उसे चीन का भारत पर आक्रमण। काफी मंथन के बाद मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि इसे चीन का भारत पर आक्रमण ही कहा जाना चाहिए। आप यह सोंच रहें होंगे की मैंने ऐसा क्यों कहा। इसके पीछे मेरा तर्क है, कि 1962 मे भारत चीन के बीच जो लड़ाई हो रही थी उसमें भारत की ओर से चीन के खिलाफ किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं किया गया। उस समय चीनियों द्वारा भारतीय सीमा का अतिक्रमण किया गया, वे आये थे अपनी मर्जी से और अपनी मर्जी से लौट भी गए और ऊपर से भारतीय भूमि पर कब्जा भी कर लिया। लड़ाई में बहुत सारे भारतीय सैनिक शहीद हुए लेकिन इसमें एक भी चीनी हताहत नहीं हुआ। इसका क्या अर्थ निकाला जाय, यही न की यह एकतरफा आक्रमण था, जिसमें एक शक्तिशाली आक्रमणकारी का एक कमज़ोर के ऊपर आक्रमण हुआ और इसमे कमज़ोर पीछे हटने के अलावा कुछ न कर सका।
1962 का भारत पर चीनी आक्रमण का कारण दलाइ लामा का भारत आना नहीं था, बल्कि इसके पीछे तो साम्यवादी सरकार की विस्तारवादी नीति थी। चीन के इस विस्तारवाद के कारण चीन का उसके सारे पड़ोसी देशो के साथ भूमि को लेकर विवाद चल रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं हैं। भारत-चीन सीमा पर हाल में हो रहे गतिविधियों को ध्यान से देखें तो इसमे 1962 के चीनी आक्रमण की पुनरावृति दिखती है। रोज़ाना अख़बारो और न्यूज़ चैनलों में दिखाया जा रहा है इससे क्या निष्कर्ष निकाला जाए? क्या अभी भी हमारी सरकार कानों में तेल डालकर सोई हुई है और जागने के लिए एक और आक्रमण का इन्त़जार कर रही है।
अभी जो सरकार ने चीन से संबंधित नीति को लेकर कदम उठाये हैं उससे यही लगता है कि हमारी सरकार जाग रही है। लेकिन हमारी सरकार जो काम अभी कर रही है सीमा क्षेत्रों के विकास से संबंधित वह तो 1962 के झटके के बाद ही कर लेना चाहिए था। नेता तो चुनाव से पहले लम्बी-लम्बी गप्पे हांकते हैं कि हम ये करेंगे, हम वो करेंगे, लेकिन जब वे लोग सत्ता में आते हैं तो सब कुछ भूल जाते हैं। और उनकी याद्दाश्त फिर वापस चुनाव के समय आती है, ये एक नहीं सभी सरकारो के साथ हैं, सभी झटके लगने का इंतज़ार करते हैं तभी उनकी आँखे खुलती हैं। अब आँखे खुल ही गई है तो सरकार को चाहिए कि वह चीन को मुँह तोड़ जवाब दे, सीमा क्षेत्रों के विकास कार्य को और तेज करे सैन्य शक्ति मजबूत करें। भारत की शांति की नीति को चीन हमारी कमज़ोरी समझने लगा है, उसकी इस धारणा को बदलने की आवश्यकता है। हमें ज़रुरत है हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीतिक प्रणाली और सैन्य ताकत को चीन के समकक्ष बनाने की। हमें चीनी ड्रैगन से डरने की कोई ज़रुरत नहीं है, चीन की बढ़ती आर्थिक शक्ति में भारत की भी अहम भूमिका है। यह चीन भी जानता है कि भारत के साथ संबंध खराब करना घाटे का सौदा है।



शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

सुविधा शुल्क जो देना पड़ता है!!!

हमारे देश में यह प्रचलन हो गया है कि किसी भी काम के लिए हमें सुविधा शुल्क देना पड़ता है। यह एक स्पीड मनी होता है जो आपके काम में गति लाता है और यदि आप सुविधा शुल्क नहीं देंगे तो आप कोई भी काम नहीं करा सकते। इस तंत्र ने देश में एक ऐसी कानून व्यवस्था का निर्माण किया है जो आम आदमी को हाशिए पर रखता है। देश की इस लचर कानून व्यवस्था का नौकरशाह व राजनीतिज्ञ दिल खोलकर लाभ उठाते हैं लेकिन आम आदमी को कोई भी काम कराने के लिए सुविधा शुल्क का सहारा लेना पड़ता है। जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र लेना हो, या फिर भीड़ भरी ट्रेन में सीट, हमें सुविधा शुल्क देना ही पड़ता है।
राजनीतिज्ञों के लिए यह सुविधा शुल्क मुख्य रूप से चुनाव लड़ने के काम आता है। ऐसे माहौल में जहां सभी कुछ या तो गैरकानूनी है या अवैध तरीके से प्राप्त किया जा रहा है, नियम कानून की बात करना बेमानी हो गया है। नियम कानून का पालन करने वाले लोग भी जब यह देखते हैं कि भ्रष्टाचारी फल फूल रहे हैं तो वे भी इस दबाव के आगे झुक जाते हैं। आज देश में बढ-चढ कर आम आदमी की बात की जा रही है। देश पर आए-दिन आंतरिक और बाहरी ख़तरों की बात होती रहती है मगर कोई इस सबसे बड़े ख़तरे की बात नहीं करता जो देश की जड़ों को खोखला कर रहा है। देश का हर नागरिक तभी खुद को सुरक्षित महसूस कर सकता है जब सामान्य कार्यों जैसे कि ड्राईविंग लाईसेंस या गृह लोन लेने के लिए सुविधा शुल्क नहीं देना होगा। जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक आम आदमी को सुविधा शुल्क देना होगा क्योंकि उन्हें जिंदा रहना है।

“आधुनिक आदमी”

इस खबर से उस खबर भागती रहती है ये ज़िन्दगी
दिन और रात के फासले को पाटता रहता है मन
ख़ूनी सड़कें, ख़ौफ से डरी आँखों का दर्द
‘आधुनिक’ हो चुका ये मन मेरा,
नहीं पसीजता किसी घटना से
कभी दूसरों के लहू से व्याकुल हो उठने वाला
अब नरसंहारों को भी ‘ न्यूज़ ‘ ही कहता है
पशुओं को देव-तुल्य कहने वाला अब
इंसानों को पशु-तुल्य भी नहीं समझता है।
बाढ, सूखा, आत्महत्याएँ, विरोध-प्रदर्शन,
जीवन के अब सामान्य पहलु से हो चले
डरता हूँ कहीं आधुनिकता इतनी ना बढ जाए
नर-पिशाच विशेषण, नाम के साथ जुड़ जाए।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

शर्म तुम्हें गर आती नहीं

बचपन में पढा था जल हीं जीवन है,
फिर क्यों यहाँ जीवन नहीं मरन है।
अपनी नदियों में तो जल का अंबार है,
फिर हर तरफ कैसी चीख – पुकार है
पानी में डूबे घर , खेत , आँगन: जैसे पानी ही सारा संसार है।
टीले पर छोटी सी बच्ची पानी से खेल रही है
अनाथ मासूम क्या जाने , उसकी माँ भी इसमें डूब गई है।
क्या जाने वो इस पानी ने क्या खेल खेला ,
उसके इस बिहार ने वर्षो से क्या –क्या झेला
आधुनिक विमान उपर से मंडराते है ।
नेता जी टीवी पर रोज जमकर चिल्लाते हैं,
कहते थे हम खाने के पैकेट फिंकवाते हैं,
हमारे लोग है इतने प्यारे , कुतों को भी इसमें साथ खिलाते हैं ।
टीवी वाले भी खूब ताली बजाते हैं,
दिल्ली में बैठे पूरे बिहार की हालत बताते हैं,
दुआ है कि तुम न कभी ये सब झेलो
इंसानियत बची है अगर एक बार उनके दुख को भी टटोली
शर्म तुम्हे गर आती नहीं , मत इतना चीखो चिल्लाओ
डूब चुके लोगों को ना और डूबाओ ।

मेरे लिए शराब

मैं जब-जब शराब पीता हूँ
तो समूचा जिंदा आदमी बन जाता हूँ
कुछ पल ही सही
लेकिन मेरा मरना रूक जाता है
अतीत में जितना मरा था
सब जिंदा हो जाता है
यह जिंदा होने का नशा
शराब के नशे पर हावी होने लगता है
लेकिन जिंदा होता हूँ शराब पीने के बाद

चुपचाप देखते रह गया था
चुपचाप सुनते रह गया था
बार-बार खुद को मार दिया
कभी बाबूजी ने डाँट दिया
कभी माँ ने- ज्यादा काबिल मत बनो
लेकिन अभी मैं समूचा जिंदा आदमी हूँ
कुछ पल ही सही
न बाबूजी की डाँट का डर है
न उन मठाधिशों का खौफ
इस पल को इतना जीना चाहता हूँ
कि जब-जब मरा था उसे संतुलित कर दूँ
लेकिन शराब का नशा उतरने लगता है
काश ऎसा होता कि बिना शराब पिए ही
समूचा जिंदा आदमी रहता

बुधवार, 16 सितंबर 2009

लोकतंत्र का 'कुत्ता'

गर्मियों की उस तपती दुपहरी में
सड़क के बीचोंबीच,
ट्रैफिक में फंसा वह कुत्ता
बड़ा बेचैन और सहमा था।
वह कभी इधर को भागता
कभी उधर को
लेकिन हर बार रह जाता
बीच में ही फंसकर,
जैसे फंस जाते हैं कुछ और कुत्ते
लोकतंत्र इस रेलमपेल में
डरते, भागते, सहमते और कभी-कभी
गिड़गिडाते हुए मदद का इंतजार करते।
कभी भागते हैं ये 'लेफ्ट' की तरफ
तो कभी 'राइट' की तरफ़
थकहारकर खड़े हो जाते हैं 'सेंटर' में।

इस नस्ल के कुत्ते प्रायः
सड़कों पर ही पाए जाते हैं,
दर-दर भटकते
एक-एक निवाले को तरसते और
भूख से बिलबिलाते हुए।
इन कुत्तों के नाम नहीं होते
बस होते हैं तो रंग, मसलन
काला, सफ़ेद, भूरा और
कभी-कभी चितकाबर।
कुछ की दूसरी पहचान होती है
जैसे लंगडा, काना, मह्कौआ
हाँ मह्कौआ, क्योंकि नहीं नहा पाते वो
लोकतंत्र की इस बहती 'गंगा' में,
ये तो बस नालियों में लोटते हैं।

इन कुत्तों की ज़िंदगी कभी नहीं बदलती
बदलतीं हैं तो सिर्फ
सड़कें, गलियां और इनकी पार्टियाँ।
शायद इनका भाग्य यही है क्योंकि
ये हैं इस महान लोकतंत्र के सौतेले कुत्ते
ये हैं एक आम कुत्ते॥

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

मीडिया है कठपुतली नहीं


मीडिया वो सशक्त माध्यम है जो एक आम आदमी की आवाज़ को बुलंद करता है। हमारे देश में प्रेस की स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का ही एक हिस्सा है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि हाल के कुछ वर्षोँ में जहाँ मीडिया ने कुछ अच्छे काम किए वहीं कुछ शर्मसार करने वाले मुद्दों का भी ये जनक रहा है। कई ऐसे सवाल हैं जो मीडिया की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सरकार ये निर्धारित करे कि मीडिया को क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं।
दरअसल, जब भी मीडिया को नियंत्रित या अनुशासित करने का मुद्दा सामने आता है, यह भुला दिया जाता है कि नियंत्रण का प्रावधान तो हमारे संविधान में ही है। संविधान में स्वतंत्रता की अन्य किस्मों की ही तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी निरंकुश नहीं छोड़ा गया है। उस पर लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, कदाचार, राज्य की सुरक्षा आदि के हित में अंकुश लगाने की व्यवस्था है। ये सभी शर्तें मीडिया पर भी लागू होती हैं। मीडिया के किसी भी प्रतिनिधि ने यह दावा नहीं किया है कि हम संविधान और कानून से ऊपर हैं। फिर मीडिया पर अलग से नियंत्रण लागू करने की बात सोची या कही ही क्यों जाती है?
अगर मीडिया से उसकी वही स्वतंत्रता ही छीन ली जाएगी, जिसके लिए वह जाना जाता है, तो उसका अस्तित्व ही कहाँ रह जाएगा। सरकार अगर अपने मनमाफिक ढगं से मीडिया पर अंकुश लगाने लगी तो गलत कामों की निंदा कौन करेगा? इसलिए बजाए इसके कि सरकार मीडिया के काम में हस्तक्षेप करे, उसे मीडिया को खुद को नियंत्रित करने के लिए बाध्य करना चाहिए। संवेदनशील मुद्दे जैसे हत्या, बलात्कार आदि में कुछ हदें तय की जानी चाहिए जिसकी अवहेलना करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। मीडिया पर सरकारी पाबंदी लगाना बिलकुल भी जायज़ नहीं है। हम आज भी लोकतंत्र में जीते हैं और जबरन कोई भी कानून नहीं थोपा जाना चाहिए। मीडिया को भी खुद को नियंत्रित और संचालित करने की ज़रूरत है। वरना यह टकराव बार-बार उभरता रहेगा और इससे मीडिया की छवि पर धब्बा लगेगा। एक बात तो आज मीडिया को भी नहीं भूलनी चाहिए की स्वतंत्रता अगर हदों को पार कर जाए तो उछ्छृँख्लता कहलाती है।

गुरुवार, 4 जून 2009

संसदीय राजनीति में 'बैठा'

लोकतंत्र अन्य सभी शासन प्रणालियों से बेहतर क्यों है? क्या जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा किया गया शासन ही इसकी श्रेष्ठता का उत्कृष्ट उदाहरण है। हर जन के लिए ग्राह्यता और निश्चित अवधि पर जनता के मताधिकारों का प्रयोग इसकी सर्वोच्चता को निश्चित ही सबलता प्रदान करते हैं। अब प्रश्न यह है की यह ग्राह्यता किस रूप में हो और जनता अपने अधिकारों का प्रयोग कैसे करे? अन्य प्रणालियों की तरह लोकतंत्र के भी अपने अंतर्विरोध हैं, होने भी चाहिए, लेकिन सवाल यह है की उन अंतर्विरोधों की सीमा क्या हो? हर जन की भागीदारी सुनिश्चित करने के पीछे कहीं लोकतंत्र के बने-बनाए हुए मूल्यों और आदर्शों पर तो कुठाराघात नहीं हो रहा है इसकी भी जांच जरूरी है।


झारखण्ड के पलामू संसदीय सीट से आखिरकार नक्सली नेता कामेश्वर बैठा संसद पहुचने में कामयाब हो ही गए। गौरतलब है की बैठा इससे पहले गढ़वा, पलामू और कैमूर आदि ज़िलों के ज़ोनल कमांडर रह चुके हैं। अब नक्सालियों के बारे में थोड़ी सी जानकारी रखने वाला शख्स भी जानता होगा की ज़ोनल कमांडर क्या चीज़ होता है। बहरहाल, उन्होंने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के टिकट पर जेल से ही चुनाव लड़ा और विजयी हुए। इन महाशय पर सौ से भी ज्यादा आपराधिक मामले हैं जिनमें भारतीय दंड संहिता की ३०२, १२४, ३०७, ३२४, ३२६ जैसी धाराएँ शामिल हैं। पलामू और आसपास के इलाके में 'बैठा' किसी परिचय (कुख्यात) के मोहताज़ नहीं हैं। फिर भी उन्हें एक लाख अडसठ हज़ार के आसपास वोट मिले और राजद के अपने निकट प्रतिद्वंदी और पिछले बार के सांसद 'घूरन राम' को उन्होंने तेईस हज़ार वोटों से हराया।


कहते हैं हर जनादेश कुछ कहता है। तो फिर यह जनादेश क्या कहता है? क्या लोकतंत्र को अपराधियों के प्रति अपनी ग्राह्यता बढ़ानी चाहिए या उन्हें हाशिये पर डालकर सबक सिखाना चाहिए। इन प्रश्नों पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार करना बहुत जरूरी है। इस बार कितने ही बाहुबली (मीडिया ने अपराधिक छवि वालों के कलंक को धोने के लिए अच्छा नाम दिया है) मैदान में थे लेकिन उनका हश्र क्या हुआ? जो नहीं लड़ सके उन्होंने घरवालों को लड़वाया लेकिन फिर भी बात नहीं बनी। चाहे वो हीना शहाब हों, वीणा सिंह हों या फिर मुख्तार अंसारी, साधु यादव और फिर अबू आज़मी। परन्तु क्या कारण है कि इसी जनादेश से नक्सलियों का एक ज़ोनल कमांडर उभरकर संसदीय राजनीति में अपनी पहचान बना लेता है। तो क्या जनता के लिए अपराधी और नक्सली में अंतर है या की पलामू की जनता का जनादेश खंडित और मूर्खतापूर्ण है। या फिर की इतना सबकुछ देखने के बाद भी नक्सली विचारधारा का प्रभाव लोगों के ज़ेहन से अभी उतरा नहीं है।


कहने वाले कह सकते हैं कि इस बार का चुनाव विकास के मुद्दे पर केन्द्रित था और हो सकता है घूरन राम इसमें फिसड्डी साबित हुए हों सो जनता ने बैठा पर विश्वास जताया है। अब जिसने कितने लोगों का खून बहाया है, सरकारी सम्पतियों का विनाश किया है और कितने ही पुलिस वालों को असमय काल के गाल में पहुचाया है उससे विकास की उम्मीद करना क्या बेमानी नहीं है? या हो सकता है भविष्य इसका बढ़िया फैसला करे लेकिन जनता ने आखिकार कितने ही अपराधियों के कार्यों का लेखा-जोखा तो देखा ही है जिन्होंने सत्ता का उपयोग विकास के लिए कम लेकिन अपनी दबंगता को चमकाने में ज्यादा किया है। वैसे भी बीजापुर, दंतेवाडा के नक्सली नेता 'रेंगम' यह बात कह ही चुके हैं कि हमारी सीधी लडाई सत्ता से है और सत्ता, सरकार में परिवर्तन ही हमारा मुख्य उद्देश्य है। तो क्या बैठा भी अपनी समानांतर सत्ता चलाएंगे? या फिर जैसे अमेरिका ने तालिबान को 'बढ़िया' और 'ख़राब' की श्रेणी में बांटा है वैसे हमें भी 'बढ़िया' और 'ख़राब' नक्सली का विभाजन करना होगा।


अब इसी लोकतंत्र और चुनावी राजनीति के दूसरे पहलु पर गौर करते हैं। जिसे दो साल या अधिक कि सज़ा नहीं हुई हों वह निर्विरोध चुनाव लड़ सकता है, संसदीय राजनीति में अपना सर ऊँचा कर शेर कि तरह दहाड़ सकता है लेकिन वहीँ दूसरी तरफ 'विनायक सेन' को दो साल जेल में सिर्फ इसलिए रखा जाता है क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर नक्सलियों कि मदद की। इसे भी छत्तीसगढ़ सरकार सिद्ध नहीं कर पाई। अब यह लोकतंत्र ही बताए कि एक डॉक्टर उस मरीज़ कि सेवा करे या नहीं जो अपराधी या नक्सली है। मारने वाला दोषी होता है या बचाने वाला? वहीँ दूसरी तरफ 'सलवा जुडूम' के नाम पर सैकड़ों आदिवासी मार दिए जाते हैं, विदर्भ के जिन लोगों का 'टाडा' रुपी घाव अभी सूखा भी नहीं हो वहां नक्सली और अपराधी चुनाव लड़ते हैं, संसद पहुचते हैं और सत्ता कि मलाई चाभते हैं। सरकार छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, बंगाल, बिहार, झारखण्ड आदि कई जगहों पर लाल झंडे का प्रकोप देख चुकी है और देख रही है। विचारधारा का अंत और समानांतर सरकार चलाने कि मंशा अब बच्चा-बच्चा जानता है। नेपाल का उदाहरण भी सामने ही है। ऐसे में लाल झंडे के साथ क्या किया जाए इसपर सोचने का वक़्त आ चुका है।


'बैठा' कि जीत के बाद 'अर्जुन मुंडा' ने कहा कि "इस तरह के उदाहरण लोकतंत्र को मजबूत करेंगे। अब तो इसका सीधा मतलब यह हुआ कि आप चाहे जितने कत्ल करें, दहशत फैलाएं लोकतंत्र कि संसदीय प्रणाली में आने से आपके सारे पाप धुल जायेंगे। तो क्या लोकतंत्र कि ग्राह्यता को बढाने, उसे मजबूत करने के लिए सैकड़ों जानों कि बलिदानी जरूरी है या कि दाउद इब्राहीम भी आकर चुनाव लड़ ले और गलती से जीत जाए तो इससे उसके सारे पाप धुल जायेंगे और लोकतंत्र मजबूत होगा। उन्होंने इसकी तुलना नेपाली व्यवस्था से कि है लेकिन उन्हें जानना चाहिए कि नेपाल के माओवादियों और यहाँ के नक्सलियों कि लड़ाई में बहुत अंतर है। यह इतिहास रहा है कि अपने किए पापों को छिपाने, उनकी करनी कि सज़ा पाने से बचने के लिए राजनीति एक महफूज़ जगह रही है। यहाँ कोई आपको जल्दी हाथ नहीं लगा सकता। अब इस लोकतंत्र और संसदीय राजनीति कि यह विडम्बना घातक रूप ले चुकी है जिसे सिर्फ जनता के भरोसे छोड़ना उचित नहीं है।


मै 'बैठा' या इस तरह के अन्य किसी व्यक्ति के लोकतंत्र कि मुख्यधारा में शामिल होने का विरोधी नहीं हूँ, और न ही संसदीय राजनीति में उनकी कार्यकुशलता को लेकर भयभीत, लेकिन मेरा मानना यह है कि इस तरह के सभी लोगों को उनके किए कि पूरी सज़ा मिले इसके बाद ही उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार हो। लोकतंत्र कि ग्राह्यता को बढाने के कुछ पैमाने होने चाहिए तभी यह सच्चे रूप में जनता का शासन बना रह पाएगा नहीं तो हमारे सामने साम्यवादियों का ज्वलंत उदाहरण है ही।

सोमवार, 1 जून 2009

प्रयोग या परिणाम?

मीरा कुमार को लोकसभा का अध्यक्ष बनाकर भारत के संसदीय इतिहास में एक नई इबारत लिख दी गई है। १५वीं लोकसभा, २००९ का चुनाव जहाँ कांग्रेस के लिए एक नया उत्थान सन्देश लेकर आया वहीँ संसदीय राजनीति का चेहरा भी प्रकाशवान हुआ है। मीरा कुमार के रूप में पहली बार किसी महिला को लोकसभा अध्यक्ष का पद सौंपा गया है। पिछले लोकसभा के अध्यक्ष, सोमनाथ चटर्जी का कार्यकाल अंतिम दिनों में जिस तरह बीता, उसको भुलाने और उसपर मरहम लगाने में शायद यह प्रसंग कुछ काम करे। इंदिरा गाँधी, प्रतिभा पाटिल और किरण बेदी के बाद एक बार फिर नारी सशक्तिकरण का उभार दिखा है। यधपि किरण बेदी का संसदीय राजनीति से जुडाव नहीं था लेकिन उनको इस लीग में शामिल करने का मेरा अपना मत है।

राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर काफी बहसें हो चुकी हैं। १५ वीं लोकसभा का चुनाव इस मामले में भी ऐतिहासिक साबित हुआ कि संसदीय राजनीति में महिलाओं कि संख्या आखिकार ५० को पार कर गयी। इस बार कुल ६१ महिलाएं संसद में होंगी। तो क्या सचमुच भविष्य में, संसदीय राजनीति में इनकी प्रभुत्व में इज़ाफा होगा? क्या राजनीतिक पार्टियाँ और जनता इस ग्राह्यता के लिए तैयार हैं? इसी सिक्के के दूसरे पहलु पर गौर करते हैं। इस बार कुल चार सौ उनसठ महिलाएं उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुई थीं जिसमे सिर्फ ६१ को ही सफलता मिली। यह आंकड़ा थोड़ी देर को सोचने पर मजबूर भी करता है कि क्या कारण है कि जनता ने बाकी तीन सौ अनठानवे को नकार दिया? क्यों इतने कम स्तर पर सफलता मिली। तो क्या हमें मान कर चलना चाहिए कि लोकतंत्र इस परिवर्तन के लिए इतनी जल्दी तैयार नहीं है? या फिर की आंकड़ें ही सबकुछ नहीं बताते.

एक अनुमान के मुताबिक ग्राम समिति से लेकर लोकसभा तक कुल अड़तीस लाख उम्मीदवार हैं लेकिन इनमें महिलाओं की संख्या लाख दो लाख से ज्यादा नहीं है। इनकी भागीदारी का प्रतिशत हुआ महज़ तीन के आस-पास। संसदीय राजनीति की बात करें तो ५४३ में ६१ उम्मीदवारों का प्रतिशत ११ के आस-पास है। पहले वाले के मुकाबले यह ज्यादा जरूर है लेकिन संतोषजनक नहीं। यह भी उसी लोकतंत्र (बराबरी का?) की विडम्बना है जहाँ बीस बड़े उद्योग घराने देश की जीडीपी के बीस प्रतिशत भाग पर कुंडली मारे बैठें हैं और चौरासी करोड़ लोगों को बीस रुपया प्रतिदिन भी नहीं मिलता है। महिला आरक्षण विधेयक को ही देखिए जो देवगोड़ा के समय से ही लटका पड़ा है। हमेशा इसे या तो पिछले दरवाजे (राज्यसभा) से लाया जाता है या संसद सत्र के ख़त्म होने के समय पर। अब ऐसे में मीरा कुमार का उदाहरण नारी सशक्तिकरण के रूप में कितना कारगर सिद्ध होगा यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा।

लोकतंत्र अन्य सभी शासन प्रणालियों से बेहतर है क्योंकि यह प्रयोगों का घर है। ये प्रयोग इसे जड़ होने से बचाते हैं और इसकी बनाई हुई आस्थाओं को मजबूत करतें हैं। मीरा कुमार का उदाहरण भी इस सन्दर्भ में प्रासंगिक है। परिवारवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, धर्मवाद और क्षेत्रवाद के बाद यह एक और सफल प्रयोग है। वैसा ही प्रयोग जैसा मुस्लिमों के साथ होता रहा है। जगजीवन बाबू की बेटी और दलित होना उनके लिए ज्यादा अनुकूल हुआ। बहुजन के लिए कांग्रेस का यह एक बड़ा सन्देश भी है और महिलाओं के लिए तो है ही। वैसे भी संसदीय राजनीति की यह पहचान रही है की परिवर्तन के लिए कुछ ऐसे तत्त्व जरूर होने चाहिए जो जनता के जेहन से जल्दी विस्मृत नहीं हों।

मीरा कुमार और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर कांग्रेस का दृष्टिकोण चाहे जो भी हो लेकिन पार्टी ने संसदीय राजनीति में मील का पत्थर तो स्थापित किया ही है। अब पार्टी को चाहिए की वह महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाकर एक और मील का पत्थर स्थापित करे और लोकतंत्र को शुभ संकेत दे। इस बार लालू और मुलायम का दबाव भी नहीं है। इन्होनें तो मंडल की मलाई खूब खाई लेकिन बराबरी की बात पर फटाक से उल्टी कर देते हैं। खैर! जनता ने जिस भाव से प्रेरित होकर जनादेश दिया है उसका सकारात्मक उत्तर देना कांग्रेस का कर्तव्य होना चाहिए। मीरा कुमार के बहाने एक शुभ संकेत तो मिल ही चुका है, कांग्रेस को कोशिश करनी चाहिए की मीरा कुमार एक प्रयोग मात्र बनकर न रह जाएँ बल्कि उनकी तरह और परिणाम सामने आएं। प्रयोग परिणाम की सीढ़ी होनी चाहिए एक छलावा नहीं।

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

शन्नो की आकृति

बाल कल्याण मंत्री 'रेणुका चौधरी' ने भले ही यह कह दिया की 'शन्नो और आकृति के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया गया है। राष्ट्र के निर्माण में हर बच्चा एक इकाई की तरह है'। लेकिन कुछ सवाल हैं जो उनकी इस बात के विरोध में दिखाई देते हैं। एक सवाल यह भी उठना चाहिए की क्या सचमुच एक झुग्गी में रहने वाले, सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले और एक पॉश इलाके में रहने वाले और अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे में सचमुच कोई भेदभाव नहीं होता है?

बहरहाल, शन्नो और आकृति दोनों ही लड़कियाँ स्कूल के दोषपूर्ण रवैए के कारण अब इस दुनिया में नहीं हैं। शन्नो भवाना के एमसीडी स्कूल की दूसरी क्लास में पढ़ने वाली ११ वर्षीया छात्रा थी, जो कड़ी धूप में मुर्गा बनाए जाने के कारण कोमा में चली गयी थी और उसके बाद उसकी मौत हो गयी। वहीँ आकृति भाटिया वसंत कुंज के माडर्न स्कूल में बारहवीं की छात्रा थी जो अस्थमा की मरीज थी। सही समय पर चिकित्सा की सुविधा नहीं मिलने पर उसकी मौत हुई। दोनों ही जगहों पर स्कूल की खामियाँ दो मौतों के रूप में उजागर हुई।

अब फिर से हम अपने सवाल पर आते हैं। शन्नो की मौत पंद्रह अप्रैल को हुई। अगले ही दिन स्कूल की अध्यापिका को निकाल दिया गया। आकृति की मौत इक्कीस अप्रैल को हुई और उसके बाद क्या हुआ सबको पता है। शन्नो की मौत के दस दिनों बाद तक रेणुका जी कुछ नहीं बोलती हैं लेकिन आकृति की मौत के बाद महज तीन-चार दिनों के भीतर ही वो क्यों सबके सामने आकर बोलती हैं? इक्कीस अप्रैल के बाद चार दिनों के भीतर ही वो पच्चीस अप्रैल को प्रेस कांफ्रेंस करती हैं। शन्नो की मौत के दस दिनों तक वो कहाँ थी? वही आकृति की मौत के बाद उनका बयान महज तीन से चार दिनों के भीतर आ गया। क्यों? सवाल यह है की अगर शन्नो के बाद आकृति की मौत नहीं हुई होती तो भी क्या रेणुका जी प्रेस कांफ्रेंस करतीं? निश्चित तौर पर आकृति की मौत के बाद उसके माँ-बाप के प्रभाव के चलते उन्हें जवाब देना पड़ा होगा। तो क्या एक गरीब छात्रा की मौत पर उनको वैसा दुःख नहीं हुआ जैसा की आकृति की मौत पर, जिसका उन्हें सरेआम इज़हार तक करना पड़ा। शन्नो की मौत के महज कुछ दिनों के भीतर हुई आकृति की मौत ने निश्चित रूप से एक उत्प्रेरक का काम किया। जो मामला ठंढा पड़ता जा रहा था और जिसपर बाल कल्याण मंत्रालय ने कोई बयान नहीं दिया उसे इसके लिए मजबूर होना पड़ा।

अब भले ही रेणुका जी जो चाहे कह ले लेकिन अमीर बनाम गरीब का सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है। एमसीडी के स्कूल अभी भी उपेक्षा के ही पात्र हैं। अभी दिल्ली में चल रहा ताज़ातरीन मामला ही देखिए। पूर्वी दिल्ली के विनोद नगर, कड़कड़डूमा आदि इलाकों से सैकड़ो बच्चे गायब होते जा रहें हैं परन्तु सरकार को शायद कोई परवाह नहीं है। बाल कल्याण मंत्रालय भी चुप्पी साधे हुए है। पुलिस तो यहाँ तक कह देती है की मामला प्रेम प्रसंग या घर से भागने का है। गौरतलब है की इसमें पांच से आठ साल के बच्चे भी शामिल हैं। अब पुलिस से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाता की आठ साल का बच्चा कैसे प्रेम प्रसंग करेगा? निठारी काण्ड को ही लीजिए। पुलिस और प्रशासन ने कई सालों तक मामले पर ध्यान नहीं दिया था जिसकी परिणति कैसी हुई सबके सामने है। वहीँ कुछ साल पहले नॉएडा में एक बड़े कंपनी के सीईओ के बेटे का अपहरण हुआ था तो कैसे पुलिस और प्रशासन हरकत में आ गयी थी। कुछ ही दिनों के भीतर उन्होंने मामला सुलझा भी लिया था। तो फिर ये मामले क्यों अधूरे पड़े हैं? क्या प्रशासन इन्हे सचमुच सुलझा नहीं पा रही है या इससे उन्हें कोई खास मतलब नहीं है? कारण वही की झुग्गियों में रहने वाले बच्चों की कोई औकात नहीं होती? उनकी परवाह किसी को भी नहीं है।

अमीर बनाम गरीब का सवाल हमेशा से रहा है और शायद अभी ख़त्म भी नहीं होने वाला है। अब रेणुका चौधरी भले ही इससे इंकार कर ले लेकिन सच्चाई उन्हें भी पता है। शन्नो और आकृति भले ही इस दुनिया में नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने एक बार फिर से इस समाज की दुखती रग पर हाथ रख दिया है जिसे छूने से शायद कई बुद्धिजीवी भी घबरातें हैं।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

जिम्मेवार कौन?

दूसरे चरण के मतदान के ठीक एक दिन पहले झारखण्ड में माओवादियों ने फिर एक बड़ी घटना को अंजाम दिया. बरवाडीह से मुगलसराए के बीच चलने वाली बीडीएम पैसेंजर गाड़ी को लातेहार के पास चार घंटे तक अपने कब्जे में रखा जिसमे अनुमानतः ७०० यात्री सवार थे. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब २००६ में इसी ट्रेन को माओवादियों ने अपने कब्जे में रखा था. गनीमत यह रही की दोनों बार उन्होंने बिना किसी को नुकसान पहुचाए ट्रेन को छोड़ दिया।

झारखण्ड में नक्सली हिंसा कोई नई बात नहीं है. परन्तु क्या कारण है कि चुनाओं के दौरान उसका वीभत्स रूप उभरकर सामने आता है? जब तक २५-५० जवान कुर्बान नहीं हों, दो-चार बारूदी सुरंग न फटें तबतक यहाँ चुनाव नहीं हो पाते. सरकार चाहकर भी(?) क्यों नहीं कुछ कर पाती? आप किसी भी ज़िले में घूम लीजिए, हर जगह चुनाव बहिष्कार के पोस्टर दिख जायेंगे.

पिछड़ों कि राजनीति कर अब अपने ही स्वार्थ में लीन हो चुके नक्सलियों को यह मंजूर नहीं कि सरकार उनके अस्तित्व को नकारे. जब भी ऐसी कोशिश हुई है उन्होंने अपनी उपस्थिति का अहसास कराया है. सरकार के प्रति उनका असंतोष जगजाहिर है परन्तु कारण बहुत हद तक धुंधले पड़ चुके हैं. सत्ता और वर्ग संघर्ष का यह खेल अदभुत है. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब बीजापुर के घने जंगलों में तहलका के 'अजीत साही' के साथ हुए इंटरव्यू में नक्सली नेता 'रेंगम' ने इस बात को स्वीकारा है कि हम अपनी सरकार चाहते हैं. आखिरकार झारखण्ड में नक्सलियों के इस बढ़ते वर्चस्व का कारण क्या है?

सबसे पहली बात तो जिन संसाधनों और आदिवासियों के कल्याण के लिए अलग झारखण्ड राज्य की स्थापना हुई थी आज वही सन्दर्भ गायब हो चुका है. आदिवासियों के कल्याण के लिए बने शिक्षा, रोजगार की योजनाएं दम तोड़ रही हैं. वे आज भी अत्यंत गरीब, अशिक्षित और बेरोजगार हैं. उनका भरपूर दोहन किया जाता है. जहाँ १२५ रुपये दैनिक मजदूरी का प्रावधान है वही पाकुड़ ज़िले के कई संथाली मात्र ७०-८0 रुपये पर मजदूरी करते हैं. सरकार ने इनकी कितनी ही जमीन कारपोरेट घरानों को दे दी है. एक अनुमान के मुताबिक यहाँ लगभग सौ उद्योग लगने वाले हैं जो आदिवासियों के विद्रोह के कारण फिलहाल ठंढे बस्ते में हैं. अगर प्रमाण चाहिए तो आप पाकुड़, दुमका, गोड्डा आदि ज़िलों का भ्रमण कर लीजिए. सरकार का भेदभावपूर्ण रवैया, ग्रामीणों का असंतोष और उनकी निरक्षरता माओवादियों के सफलतम हथियार हैं.

एक अन्य कारण है इस राज्य की भौगोलिक बनावट जिसके बारे में ज्यादा बताने की जरुरत नहीं है.
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कारण राजनैतिक है. अपने नौ साल की छोटी सी जीवन अवधि में झारखण्ड की राजनीति काफ़ी अस्थिर रही है. नेताओं ने निजी स्वार्थ के लिए संसाधनों का भरपूर दोहन किया है. आदर्श राज्य बनाने की बात कोरी बकवास साबित हुई है. नक्सली खुलेआम हर निर्माण कार्य पर, खदानों से, पैसे वालों से लेवी लेते हैं जिसे सरकार रोक नहीं पाती. सबसे बड़ी बात कि कई नेता ऐसे हैं जिनकी नक्सलियों से सीधी सांठ-गाँठ है. ताजा उदाहरण ही लीजिए- झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने पलामू संसदीय सीट से कामेश्वर बैठा को अपना उम्मीदवार बनाया है. ये वही 'बैठा' हैं जो चन्द साल पहले गढ़वा, पलामू, कैमूर आदि ज़िलों के ज़ोनल कमांडर रह चुके हैं. जिनके नाम से लोग कांपते थे. जहाँ सरकार और नक्सलियों में अंतर्विरोध महज एक दिखावा हो वहां ऐसे हालात तो बनेंगे ही.

कुछ समय कि घटनाओं से, जो बना बनाया विश्वास था कि नक्सली आम लोगों को नहीं मारते वो अब टूट चुका है. कहीं १९८७ कि वो याद फिर से न ताज़ा हो जाये जब आंध्र प्रदेश में पीपुल्स वार ग्रुप के महासचिव 'सीतारमैया' ने पांच विधायकों का अपहरण कर लिया था और कहा था कि " ज़रूरत पड़ी तो राजीव गाँधी को भी अगवा किया जा सकता है". इस बार भी भले ही उन्होंने बिना किसी को नुकसान पहुचाए ट्रेन को छोड़ दिया लेकिन सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है कि इन सबका " जिम्मेवार कौन?"

रविवार, 19 अप्रैल 2009

लोकतंत्र में 'जूता'

कहते हैं जब आदमी हर जगह से निराश हो जाता है तो भगवान को याद करता है। उनसे मदद मांगता है न मिलने पर उन्ही को कोसता भी है। लेकिन अब लोगों ने भगवान को छोड़कर जूते का सहारा ले लिया है। चारों तरफ दनादन जूते बरसें, अभी बरस रहे हैं, और मौसम देखकर लग रहा है की बरसते ही रहेंगे। इसके संस्थापक या कहे की पितामह का दर्ज़ा
मुन्तज़र-अल-ज़ैदी
को दिया जाना चाहिए जिन्होंने पहली बार में ही ऐसा बेंचमार्क स्थापित किया की दुनिया दंग रह गयी। पहले तो लोग भौच्चके रह गए परन्तु हमेशा की तरह इस मीडिया प्रयोग को भी अपना लिया। फिर क्या था, 'बेन जिआबाओ, अरुंधती रॉय, पी. चिदंबरम और अब आडवानी' भी इस नए प्रयोग के दायरे में आ गए।

जूते के इन प्रकरणों से कुछ गंभीर सवाल निकलते हैं जिनपर विचार करना बहुत जरूरी है।

पहली बात यह की क्या कारण है की हर बार जूता निशाने से चूक गया? यह सवाल इसलिए भी अहम है की अगर कोई १०-२० फ़ुट की दूरी से जूता मारे और हर बार निशाना चूक जाये तो थोड़ा अटपटा सा लगता है। तो क्या इस जूता चलाने के पीछे सिर्फ सम्बंधित लोगों को आगाह मात्र करना था? वैसे हमे यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह 'पगड़ी उछालने' का अर्थ बहुत व्यापक होता है ठीक वैसे ही इस 'जूता फेंको' क्रांति का अर्थ बहुत बड़ा और गंभीर है।

सबसे पहला कारण तो निश्चित तौर पर असंतोष ही है। बुश कि इराक नीतियों से जनता आहत थी जिसका प्रतिनिधित्व मुन्तज़र-अल-ज़ैदी ने किया, अरुंधती रॉय के लेख से एक बड़ा तबका असहमत था जिसका प्रतिनिधित्व 'युवा' संगठन के एक नौजवान ने किया, सिख दंगों में न्याय नहीं मिलने से पूरा सिख समुदाय आहत था जिसका प्रतिनिधित्व जनरैल सिंह ने किया और बीजेपी पार्टी में फैले एक व्यापक असंतोष का प्रतिनिधित्व पावस अग्रवाल ने किया।

वस्तुत लोकतंत्र में फैलती गहरी असमानता, तंत्र से 'लोक' को अलग करने कि साज़िश और समाज में फैलते असुरक्षा के भाव ने लोगों को जड़ तक आहत और आक्रोशित किया है। इस आक्रोश का सैलाब मुंबई हमलों के बाद फूट पड़ा जिसका नेतृत्व भले ही खाते-पीते मध्यवर्ग ने किया परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से इसमें सबकी भागीदारी रही। लोकतंत्र का 'लोक' अब ऐसे मुहाने पर आ खड़ा है जहाँ से वो अब सिर्फ कड़े फैसले ही लेगा।

एक बात और आडवाणी पर जो जूता चला वो और मामलों से बिलकुल अलग रहा। जहाँ पार्टी ही सर्वेसर्वा हो, वहां पार्टी के ही एक कार्यकर्ता द्वारा,पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर जूता फेंकना बिल्कुल नई घटना है। पार्टी को मानने और उसकी विचारधारा को ग्रहण करने में सालों का वक़्त लगता है, फिर क्या बात रही की सालों की यह विचारधारा एक जूते के तले सिमट गयी। सवाल सचमुच बहुत गंभीर है।

'भारतीय लोकतंत्र में जूता' महज असंतोष, क्रोध और क्षोभ का ही सूचक नहीं है। यह दिखाता है की जब लोकतंत्र के पहरेदार, 'लोक' को भूलकर, केवल सूने तंत्र की बात करेंगे तो लोक को आखिरकार संकेतों के रूप में जूते ही चलाने पड़ेंगे। ये शायद सीधे-सीधे नहीं लगेंगे लेकिन मीडिया कवरेज से ऐसी मारक क्षमता विकसित करेंगे जिसकी अनुगूँज हर कोने में सुनाई देगी।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

मीडिया- अपने ही घेरे में (१)

अगर लोगों से पूछा जाए की ओबामा के कुत्ते का नाम क्या है या कि अभी कौन सी हिरोइन ज्यादा चर्चा में है तो इन सवालों के जवाब देने के लिए शायद ही उन्हें सोचना पड़े। लेकिन सवाल को थोड़ा टेढ़ा कर दिया जाये, मसलन, अभी लैटिन अमेरिका में क्या हो रहा है या श्रीलंका की वर्तमान स्थिति क्या है तो लोग सर खुजाने लगेंगे। इस बात के लिए शायद लोग उतने जिम्मेवार नहीं हैं जितना कि मीडिया। लोगों को जो बात दिखाई जायेगी उन्हें वही बात याद रहेगी। कारण शायद वही है कि 'बो(ओबामा का कुत्ता)' और राखी सावंत के सामने लैटिन अमेरिका या श्रीलंका उतनी टीआरपी नहीं दे पाएंगे।

आज जब हर चीज़ पर आत्मचिंतन हो रहा है तो मीडिया को इससे अलग क्यों किया जाए? आज के इस दौर में जब ख़बर देने वाले ख़बर बनाने लगे हैं तो उनके चरित्र का मूल्यांकन क्यों न हो? पत्रकारिता के मिशन कि बात आउटडाटेड हो चुकी है, यह सच्चाई सभी लोग मान चुके हैं, परन्तु बची-खुची शर्म-हया और सामाजिक सरोकार को यूँ ही घोलकर पी जाना कहाँ कि बुद्धिमानी है?

आज मीडिया ज्यादा शक्तिशाली हो चुका है, लेकिन शक्ति के गरूर में वो यह बात भूलता जा रहा है कि " Great Power Comes With Great Responsibilities"।

श्रीलंका में सेना ने लिट्टे के खिलाफ़ फिर से मोर्चा खोल दिया है। हाल में वहां सेना और लिट्टे के संघर्ष में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. इसमें ज्यादातर निर्दोष ही शामिल हैं. यहाँ पर सवाल यह है कि इस खूनी लड़ाई कि सही तस्वीर कितने लोगों तक पहुची है? हमारे चैनलों और प्रिंट मीडिया ने इस संघर्ष कि कितनी जानकारी दी है? शायद कम ही लोग यह जानते होंगे कि वहां पर कई बच्चों के सर उड़ा दिए गये हैं, कारण सिर्फ इतना था कि वो तमिल बोलते थे. एक महिला को उसके ८ साल के गर्भ के साथ मार दिया गया. क्यों? सरकार और सेना सभी तमिलों को लिट्टे का समर्थक मान चुकी है. यह सच्चाई क्या सबको पता है? इस घटना कि कई वीभत्स तस्वीरें मीडिया में छुपाई गयीं हैं. लगभग २०,००० से ज्यादा नागरिक युद्ध में फंसे हुए हैं और बेघर हैं. आखिर क्यों? समुदाय के नाम पर हिटलर की गाथा को दुहराया जा रहा है और लोग इससे बेखबर हैं।

हमारी मीडिया ने इक्का-दुक्का ख़बरों को चलाकर अपने काम कि इत्तिश्री मान ली। संभवत श्रीलंकन सरकार पत्रकारों को अन्दर तक जाने कि इजाज़त नहीं दे रही, लेकिन सवाल यह है कि कहाँ गए वो खोजी पत्रकार जो कभी अपनी जान पर खेलकर खबरें लाते थे? क्या मीडिया अब अपने ही बनाए घेरे में कैद हो चुकी है? यहाँ मै एक चीज़ कहना चाहता हूँ कि जिस अरुंधती रॉय पर कश्मीर के खिलाफ़ लिखने पर जूता चलाया गया उन्होंने निश्चित तौर पर इस मामले में बहुत अच्छी रिपोर्टिंग की है।

मीडिया ने सच्चाई को दरकिनार कर फ़ालतू की खबरें दिखाईं थी, मसलन, तमिलनाडु में इस मुद्दे से फैले असंतोष, सरकार गिराने की धमकी आदि। ख़बरों को छिपाने के लिए वही हथकंडा अपनाया गया जो तहलका काण्ड के समय किया गया था। दरअसल आज मीडिया अपने लिए तय न्यूनतम पैमाने से भी नीचे जा गिरा है। सामाजिक सरोकार और जनहित की बात आज टीआरपी के विशाल बरगद के नीचे खड़े उस छोटे पौधे के समान है जिसका आस्तित्व बरगद के सामने बौना हो जाता है।


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सोमवार, 6 अप्रैल 2009

राजनीति बनाम सामाजिक कार्यकर्ता

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले की मानवाधिकार कार्यकर्ता रोमा मलिक ने वरुण गाँधी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाए जाने का समर्थन किया है। रोमा मलिक सन् २००० से एक संस्था चला रही हैं जिसका नाम है- नेशनल फोरम ऑफ़ फॉरेस्ट पीपुल एंड फॉरेस्ट वोर्केर्स। इनकी संस्था का काम है लोगो में राजनितिक समझ को पैदा कर समाज में होने वाले भ्रष्टाचार को ख़त्म करना। बहरहाल, वरुण गाँधी पर यह कानून लगाया जाना उचित है या नहीं इसपर राजनीतिक विद्वान् पहले ही काफी टिपण्णी कर चुके हैं। यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के दृष्टिकोण में भी वरुण पर लगा यह प्रतिबन्ध सही है।

अगर हम सिर्फ रोमा जी के समर्थन की बात करें तो मामला सिर्फ दृष्टिकोण और अपने नज़रिए को प्रस्तुत करने जैसा प्रतीत होता है। यह सही है की कोई भी व्यक्ति समाज में अपनी निजी राय प्रस्तुत कर सकता है। परन्तु अगर उनके तर्क पर गौर किया जाये तो कुछ प्रश्न निकलकर सामने आते हैं। सबसे पहले उनका तर्क देखिए-
" वरुण पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाए जाने का मैं समर्थन करती हूँ। बीजेपी के नेताओं को ऐसे कड़े कानूनों का पता चलना चाहिए जिसका वे समर्थन करते हैं। छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को ऐसे ही कानूनों के तहत लम्बे समय से जेल में रखा गया है। अब वरुण गाँधी पर जब रासुका लगा तो बीजेपी नेता घड़ियाली आंसू क्यों बहा रहे हैं?"

पहली नज़र में यह बयान किसी राजनीतिक पार्टी का लगता है। परन्तु एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने ऐसा बयान दिया है, सोचने लायक है। अब यहाँ ये प्रश्न उठते हैं कि कोई भी समाज एक मानवाधिकार कार्यकर्ता से क्या उम्मीदें कर सकता है? क्या वह कार्यकर्ता सिर्फ मनुष्यता के नाते लोगों के अधिकारों की बात करता है या वह पूर्वाग्रह ग्रसित भी होता है? सामाजिक द्वन्द और तेजी से बढ़ते मानवाधिकार हनन के इस दौर में क्या हम इनसे ज्यादा की अपेक्षा कर बैठे हैं? और एक यक्ष प्रश्न की, क्या ये कार्यकर्ता सिर्फ समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए ही मानवाधिकारों की दुहाई देते फिरते हैं? इन प्रश्नों पर विचार करना अब जरुरी हो गया है।

छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने विनायक सेन के साथ जो किया है वो बहुत दुखद और निंदनीय है। शायद ही कोई बीजेपी के इस कारगुजारी को सही कहेगा। परन्तु क्या रोमा जी सिर्फ इसी आधार पर, वरुण गाँधी के साथ हुए अन्याय को सही ठहरा सकती हैं? हो सकता है बीजेपी के लिए उनके मन में गहरा क्रोध हो और वो सही भी हो सकता है, परन्तु उसी पैमाने पर सभी चीजों को तौलना सही है? एक पार्टी के आधार पर उसके कार्यकर्ता के साथ हुए अन्याय को सही कहना बिलकुल ठीक नहीं है। मानवाधिकारों के हनन का फैसला मनुष्यता के आधार पर होता है, पार्टी के आधार पर नहीं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें की रोमा जी पर भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा हुआ है। अपने साथ हुए अन्याय को देखकर भी वो अन्याय को समझ नहीं पा रहीं हैं।

रोमा जी को यह बताना चाहिए की वो मानवाधिकारों की जो लडाई लड़ रही हैं क्या उसके लिए सिर्फ़ मानव भर होना जरुरी नहीं है? या फिर किसी के आधिकारों को दिलाने के लिए वो उसकी पार्टी,धर्म आदि चीजों को भी देखती हैं। वरुण गाँधी ने जो कहा गलत था और रासुका लगाना उससे भी गलत। रोमा जी को भी यह जानना चाहिए की बतौर एक सामाजिक कार्यकर्ता, उनके लिए वरुण पहले एक आम इंसान हैं बीजेपी के उम्मीदवार बाद में।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

मनमोहन जी, ज़रा गौर फरमाइए.........

एक भारतीय जनता की तरफ से मनमोहन जी को कुछ सुझाव।

*** आपको दुबारा प्रधानमंत्री पद पर बैठाने की बात हो रही है। शायद आप भी मना नहीं ही करेंगे। अगर आप दुबारा प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो कृपया लोकसभा का चुनाव लड़कर आइये। इससे आपके आलोचकों का मुंह तो बंद होगा ही साथ ही साथ आप जनता को अपने ज्यादा करीब पाएंगे।

*** बुश के बाद अब आपने ओबामा से कहा है की भारतीय जनता आपको बहुत प्यार करती है। इसमें कितनी सच्चाई है आपको भी पता ही होगा. कूटनीति के चक्कर में भारतीय जनता की भावनाओं के साथ यह खेल ठीक नहीं है।

*** लोकसभा में आपने अपने सभी भाषण अँग्रेज़ी में दिए हैं। वहीँ दूसरी तरफ देश में दिए गए कुल भाषणों में ४९९ अँग्रेज़ी में और सिर्फ़ ५ हिंदी में हैं। हिंदी की इतनी तौहीन ठीक नहीं है।
उदाहरण के लिए आप फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी को देखिये जो ज्यादा से ज्यादा भाषण अपनी भाषा में देते हैं।

*** अंत में, आपने महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाने में भी ज्यादा रूचि नही दिखलाई।

-----आप निश्चित ही काफी ईमानदार छवि के नेता रहे हैं। अत्त आपसे अनुरोध है की इस लोकसभा चुनाव में इन मुद्दों पर ज़रा ईमानदारी से गौर फरमाइएगा।


एक भारतीय नागरिक
बादल

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

क़साब के बहाने कुछ सवाल

मुंबई हमलों के दोषी क़साब की तरफ से मुकदमा लड़ने के लिए नियुक्त वकील 'अंजलि वाघमारे' के घर पर जिस तरह पथराव किया गया, इससे कुछ सवाल निकलकर सामने आएँ हैं। गौरतलब है की वकीलों ने यह केस लड़ने से मना कर दिया था जिसके बाद विशेष अदालत ने इस केस में उन्हें
क़साब की तरफ से नियुक्त किया है। अपने घर पर हुए इस पथराव के बाद उन्होंने कहा है की उन्हें एक दिन का समय चाहिए, जिसमें वो यह फैसला कर सकें की वो यह केस लडेंगी या नहीं।

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और यहाँ पर सारी प्रक्रिया का संचालन लोकतंत्र के अनुसार होता है। न्यायपालिका इस लोकतंत्र की उच्चतम संस्था है, जो शायद अभी तक दागदार नहीं हुई है। परन्तु इस घटना ने हमारे लोकतंत्र के सामने एक प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह बहस अब होनी ही चाहिए की क़साब जैसे आतंकियों को वकील मिले या नहीं? निश्चित तौर पर क़साब घृणा का हकदार है और होना भी चाहिए,परन्तु क्या सिर्फ उसी घृणा के कारण हम अपनी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ही कुचल डालें? लोकतत्र में हर व्यक्ति को, चाहे वो अपराधी ही क्यों न हो, पूरा हक है की वह अपने बचाव में वकील रखे। फिर कसाब के लिए यह दुहरा पैमाना क्यों?

कुछ लोग यह सवाल कर रहें हैं की उसने देश की अस्मिता को चोट पहुचाई है, मुंबई नगरी को दो दिनों तक कैद सा कर दिया था, और सबसे बड़ी दरिंदगी की २०० लोगों की हत्या में वह शामिल है। इन सबके बावजूद क्या उसका केस लड़ना सही है? मै बोलूँगा जी बिलकुल उचित है। जब आपके पास उसके खिलाफ सारे सबूत हैं और आपको पता है की वो बचेगा नहीं तो फिर घबराने या उत्तेजित होने की कोई बात ही नहीं होनी चाहिए। यह लिख लीजिये की कोई भी वकील लाख कोशिशों के बावजूद उसे बचा नहीं पायेगा। अगर आप उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा देंगे तो भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका की छवि मजबूत ही होगी और वह पूरे विश्व समुदाय के लिए एक मिसाल कायम करेगी। सिर्फ भावनावों के आधार पर देश चलता तो फिर कहना ही क्या था! अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो फिर अपराधियों को जिन्दा पकड़ने की कोई जरुरत ही नहीं है। बस देखिये और मार दीजिये, परन्तु फिर बाद में मानवाधिकारों की दुहाई मत दीजियेगा।

उदाहरण के तौर पर निठारी कांड के अभियुक्तों, मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेन्द्र कोली को रखा जा सकता है। इनका अपराध भी बहुत संगीन था, शायद भारत में अपनी तरह का पहला केस था। इनका केस भी किसी वकील ने लड़ा(नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है) लेकिन फिर भी वो बच नहीं पायें। उन्हें मौत की सजा दी गयी जो बिलकुल सही है। उनका वकील न उन्हें बचा सकता था न बचा पाया। फिर कसाब के साथ ऐसा क्यों हो? मै भी चाहता हूँ की क़साब को सजा हो और वो भी मौत की। लेकिन हो तो कानून के तहत। जहाँ हमारी विधायिका और कार्यपालिका पहले ही दागदार हो चुकीं हैं वहां न्यायपालिका पर दाग न लगे तो ही बेहतर है।

बहरहाल, वाघमारे के घर पर जिन्होंने हमला किया(शायद शिवसेना के लोग) क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए की देश में सैकडों ऐसे नेता हैं जो प्रमाणिक तौर पर अपराधी हैं, फिर आप इनके खिलाफ़ क्यों नहीं कुछ करते? देश को इनके हाथों बर्बाद करवा रहें हैं और ये भी दीमक की तरह देश को चाटते जा रहें हैं। वहीँ जब महाराष्ट्र में बिहारियों पर हमला हुआ तो वे कहाँ सो रहे थे? आपने क्षेत्रवाद की गन्दी राजनीति की और एक मासूम का एनकाउन्टर कर काफी खुश हुए। क्या वो अपराध नहीं था? आप जब अपने ही भाई लोगों को मारेंगे तो दूसरा आपको क्यों न मारे? जब अपने ही घर में आग लगी हो तो बाहर वाले रोटियां सेकेंगे ही।

लोकतंत्र और सत्ता का यह खेल समय-समय पर खेला जाता रहा है और शायद खेला जाता रहेगा। लोगों को यह समझना होगा की न्यायपालिका का स्थान भावनाओं से ऊपर है और न्यायपालिका को भी इन भावनाओं की कद्र करते हुए क़साब को उचित सजा देनी होगी। निश्चित तौर पर वो सजा मौत से कम नहीं होनी चाहिए।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

राम की जय, भाजपा का भय

हिंदुबहुल इस राष्ट्र में रोज़ न जाने कितनी बार राम का नाम गूंजता होगा, परन्तु उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में 6 मार्च को जो राम नाम की उदघोषणा हुई वह अलग थी। अगर बाकी जगह भक्त और भगवान के बीच का स्नेहपूर्ण संबध रहा होगा तो यहाँ बिल्कुल खांटी कट्टरवादिता थी। राम के नाम को एक ब्लैंक चैक (हमेशा) की तरह भुनाने की ख्वाहिश थी। यह भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को मलिन कर इसे एक हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की खतरनाक मंशा थी तो वहीँ हमेशा की तरह वोट बैंक बदने की पुरानी साजिश।

वरुण गाँधी ने जिस तरह मुस्लिम समुदाय को खुलेआम कोसा, उन्हें अपमानित किया, उससे चुनावी राजनीति की गन्दगी ही उभरकर सामने आई। बाबरी मस्जिद, गुजरात और कंधमाल के बाद लोकतंत्र ने देखा की बीजेपी चारित्रिक दुराव वाली वही पार्टी है जिसकी टहनियों पर तो बड़े-बड़े अक्षरों में सेकुलर लिखा रहता है परन्तु जड़ हिंदुत्व के मुद्दे में गहरी समाई हुई है।
उन्होंने क्या बोला यह बताने की जरुरत नहीं है परन्तु यहाँ यह सवाल उठाना अनिवार्य है की क्या कोई भी नेता यूँ ही राम का नाम मटियामेट कर सकता है(वैसे बीजेपी इसमें माहिर है)? जिस राम के राज्य में चारों तरफ शांति, खुशहाली और भाईचारे का माहौल रहता था,उसी राम के नाम को दुश्मनी बढाने में कैसे प्रयोग किया जा सकता है? जिस गाँधी ने अपनी जिन्दगी देश के नाम की और जिस नाम के दम पर ये(वरुण) चर्चित हैं उन्ही के पढाए पाठ को ये कैसे नकार सकते हैं? गीता की कसम भी खा ली।

२९ साल के वरुण गाँधी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता की वो राजनीति में बिलकुल कच्चे हैं। लगभग १९ साल की उम्र से ही उन्होंने अपनी माँ मेनका गाँधी के साथ राजनीति के गुर सीखने शुरू कर दिए थे। विभिन्न बैठकों, पार्टी क्रियाकलापों में हिस्सा लेते रहे थे। परन्तु फिर भी वे राजनीति में नए खिलाडी ही हैं। इसका जोड़-घटाव उन्हें मालूम नहीं है। यह कहकर की "भाषण की सी.डी के साथ छेड़छाड़ की गयी है" उन्होंने अपनी राजनितिक अपरिपक्वता को ही दर्शाया है।

आज उन्हें दूसरे संजय गाँधी के रूप में पेश किया जा रहा है, क्या यह एक प्रोपेगंडा नहीं है? जो ऐसा कहते फिर रहे हैं क्या वो यह बताने का कष्ट करेंगे की खुद संजय गाँधी के बारे में उनकी क्या राय थी। फिर दोनों में एक हद तक समानता है जरुर। जिस साम्प्रदायिकता को संजय ने ढोया, बेटा भी उसी पेड़ का फल खाना चाहता है।
वरुण गाँधी के बयान पर सबसे ज्यादा हस्यादपद स्थिति बीजेपी और उसके नेताओं की है। पार्टी आलाकमान जहां इसे गलत बता रहा है वहीँ कुछ नेता सही। बीजेपी की यही सोच भी है की खुद को सेकुलर दिखाते हुए इस मुद्दे का पूरा का पूरा लाभ भी ले लिया जाये। न खुल कर विरोध ही किया जाये न खुल कर समर्थन ही। वैसे भी इतने बड़े मुद्दे को बीजेपी क्यों छोड़ने लगी? कितने दिनों बाद तो सोयी हुई पार्टी और कार्यकर्ताओं में जान सी आई है। इसलिए बीच का रास्ता ज्यादा बढ़िया है। वैसे भी भारत में जितने प्रतिशत की वोटिंग होती है उसका बड़ा हिस्सा गरीब या मध्य वर्ग का होता है जिसकी
भावनाओं को धर्म के नाम पर भड़काना ज्यादा आसान होता है।

इस पूरे प्रकरण से एक बात तो तय है की वरुण गाँधी ने बीजेपी के सोये हुए मुद्दे, हिन्दुत्व, में नयी जान डाल दी है। वरुण गाँधी को भी मीडिया का भरपूर प्यार मिला और वो चंद घंटों में ही प्रसिद्धी पा गए। कार्यकर्ता उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में देखने लगे हैं और उनका कथित मान भी बढ गया है। वे बीजेपी के बड़े नेताओं में गिने जाने लगे हैं। पर एक बात का पता नहीं चलता की इन तमाम बातों की रेटिंग करता कौन है? खैर!

मेरे विचार से पीलीभीत में जो भी बोला गया वो गलत है और देश की बहुजनसंख्यक जनता भी इसका विरोध करती है। बीजेपी जिस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिये वोट बनाने के फेर में है, कहीं वो दांव उल्टा न पड़ जाये। उसका दुबारा वही हाल न हो जो बाबरी मस्जिद गिरने के बाद हुआ था, जब उसने जनमत संग्रह के नाम पर वोट माँगा था परन्तु लोगों ने राम की जन्मभूमि, उत्तर प्रदेश में ही उसे हरवाया। दुबारा सत्ता नहीं दी और राम राज्य की स्थापना के विचार को खारिज़ कर दिया। परन्तु इस वाकये से एक बात और सामने आ गयी की राजनीति और सत्ता के खेल में हर चीज़ जायज़ है। यहाँ सिर्फ वोट बैंक बनाने का काम महत्वपूर्ण है। जनता की भावनाएं और उनका विकास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है।

रविवार, 29 मार्च 2009

खँडहर


इस जर्जर वीरान खँडहर से कुछ
आवाजें निकलतीं हैं, निकलकर
सघन नीरवता में गुम हो जातीं हैं।
कोई भी नहीं है, जो इसे सुन सके, महसूस कर सके
और इस खँडहर को उसकी पहचान दिला सके
क्या कोई है?


प्राचीरें टूट-टूट कर गिर रहीं हैं
भव्यता की सीमा का परिहास उड़ाती हुईं
कृतियाँ हो रही हैं मलिन, धूमिल
कोई भी नही है जो इसे संवार सके
क्या कोई है?


कल तक जहाँ चहकते थे खग-वृन्द
आज वहां मरघट सा छाया है
बढ गयी है इसकी मौलिक कुरूपता भी
नयी-नयी झाड़ियों का साया है।
कोई नहीं है जो इसे सुवासित कर सके
क्या कोई है?


कभी यह खँडहर इठलाता था
अपनी अभूतपूर्व सुन्दरता दिखलाता था
पर आज खुद पर ही शर्मिंदा है
किसी तरह टूटती ईंटों पर जिन्दा है


किसी दिवस इसे भी गिर जाना है
अंततः मिट्टी में मिल जाना है
क्या इसका अस्तित्व ऐसे ही विलीन हो जायेगा
या कभी कोई इसे बचाने भी आयेगा
पर कौन? कब? शायद पता नहीं.

शनिवार, 28 मार्च 2009

बरसात की वह रात

अभी-अभी बिजली चमकी
घने बादलों के किसी कोने से
लपलपाती, विध्वंसक, ऊष्मायुक्त
जैसे चमके थे शब्द उसके
हृदय के अन्तःस्थल में
कानों को चीरते और
मन-मष्तिष्क को झकझोरते हुए।

"तुम इस लायक कभी थे ही नही"
हाँ! बस इतने ही शब्द
परन्तु विशाल सागर सामान
जैसा सागर मेघ बनाने को आतुर थे
काफी मेहनत और ठहराव से
पर वहां ठहराव कहाँ?
बस होठ हल्के से खुलकर बंद हो गए
एक जलजले की तरह।

कदम बढ़ गए थे उसके, पीछे छोड़कर
एक निस्तब्ध, काली, स्याह विरानगी
और दो कांपते हुए टांगों को
कहीं बिछुड़ गए नभ में
बदली के दो टुकड़े भी
एक दूसरे से विपरीत
तिरस्कृत और अस्तित्वविहीन होकर

शायद वहां हवा का कोई झोंका आया था
और यहाँ दुर्भाग्य की आंधी...........


उम्मीद बाकी है.......

घनघोर तिमिर है,अरे!
पथिक पूछता पंथ कहाँ है?
दुःख व्यापित, काले नभ में सौन्दर्यित
वो आशामेघ कहाँ है?
दुखित न हो,पथविचलित न हो
अभी काफी उम्र बाकी है
शुभ ज्योत्सना युक्त रश्मि का
नवविहान अभी बाकी है।

रुको, देखो कैसी हिंसा है
गरीबी, अशिक्षा कितने पाप हैं
हाय! जन्मभूमि पर लगा कैसा श्राप है
कोई बताओ मुझे जरुर
परशुराम की कुठार कहाँ है?
नीलकंठ हृदय से निसृत
पावन विप्लव-गान कहाँ है?

दुखित न हो, क्रुद्धकम्पित न हो
अब थोड़ी ही उम्र बाकी है
अश्वाविराजित,विकराल खड़ग युक्त
एक अवतार अभी बाकी है
चन्द्ररहित निशा में
नवप्रकाश की उम्मीद बाकी है
उम्मीद बाकी है.........


वृक्ष की व्यथा

टूट-टूट कर गिरते हैं जब
डाली से पत्ते और फूल
वृक्ष विलापित होकर कहता है
कैसे जिऊंगा मै निर्मूल
कैसे दूंगा पथिकों को छाया
कहाँ पाएंगे वो फल और फूल
एकाकी तिरस्कृत होकर क्या मै
समझ पाउँगा जीवन मूल्य?

कितने कष्टों को सहकर मैंने
सिंचित किये कुछ अमूल्य उपहार
निष्ठुर पतझर के पवनो ने
किया उनपर बेवक्त प्रहार
भूमि पर गिरकर भी कुछ
लेते थे उन्मक्त सांसे
कुछ चीख-चीख कर चुप हो जाते
कुछ लगाते थे मुझसे आसें।

वही पथिक जो पाते थे
कभी इनसे सुरभि लाभ
पैरों तले कुचलकर इन्हें
करते गए मेरा उपहास।

सोचकर हर वृक्ष की व्यथा
अंतर्मन में दब जातीं हैं
कष्टों की सारी गाथाएं
वसंत में हर्ष की लतिका
पतझर में कंटक मालाएं॥

दर्द

पर दुःख से व्यथित होकर
बहते थे कभी मेरे भी नीर
सूख चुके अश्रु नयनों के
शुष्क पड़े हैं दोनों तीर।
कोई कहता निष्ठुर हो गया
कोई कहता निर्मोही
कंटक सी चुभती ये बातें
करतीं अंतर्मन को अधीर।

हृदय में अंकित शोक-संतापों को
कौन किसे अब समझाए
बिन अश्रुजल के वो निरीह प्राणी हैं
जो सहन करता है सबकुछ मौन,गंभीर॥