बुधवार, 25 नवंबर 2009

मेरे देश की जाँच एजेंसियाँ


मेरे घर के आस-पास कुछ औरतें अर्थात आँटियां रहती है। जिनका एक ही काम है। कौन किसके घर में आ-जा रहा है, किसके घर में क्या नया समान आया है, कौन क्या कर रहा है अर्थात अपने आस-पङोस की हर हलचल का इन्हें पता होता है। और हाँ, खुद की बुराईयों पर पर्दा डालना ये औरतें कभी नहीं भूलती।
ऐसा ही कुछ हाल हमारी खूफिया एजेंसियों का भी है। अमरीका जाने से पहले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं ने एक बयान में कहा था कि उन्हें आए दिन भारत की खूफिया जाँच एजेंसियों से यह सूचनाएँ मिल रही है कि पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी भारत में 26/11 जैसा एक और हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। यह खबरें प्रधानमंत्री को उन्हीं खूफिया एजेंसियों से मिली है जो 26/11 के हमले के बारे में कुछ भी बताने में नाकाम रही थी। यही नहीं, 26/11 की साजिश रचने वाले तव्वहुर राणा और डेविड हेडली नकली पासपोर्ट पर भारत भ्रमण करते रहे, दोस्त बनाते रहे और एक दिन भारत को दहला कर चले गए। मगर तब भी हमारी यही खूफिया एजेंसीयाँ घोङे बेच कर सोती रही। वह तो भला हो अमरीका की जाँच एजेंसी एफ.बी.आई का जिसने 26/11 की जाँच को फिर से नई दिशा दी वरना इस हादसे की पहली बरसी पर भी हमारी जाँच एजेंसियाँ कसाब को लेकर घिसतटी रहती और जाँच चितंबरम द्वारा पाकिस्तान पर आरोप लगाने और पाकिस्तान द्वारा उनको खारिज करने पर अटकी रहती।
भारत की जाँच एजेंसियों में शुरू से ही तालमेल की कमी रही है। जब कोई हादसा हो जाता हे तो एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाती है और फिर जाँच शुरू की जाती है। तब लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं होता। भारतीय जाँच एजेंसियाँ अभी तक भारत में हुए ज़्यादातर बम धमाकों की जाँच ही कर रही है। दोषियों को सज़ा दिलाना तो दूर की बात है। वैसे भारत की अपनी तरह की पहली जाँच एजेंसियाँ है जिसे दूसरे देश में हो रही हर हरकत की जानकारी है मगर खुद के देश में क्या हो रहा है, उन्हें दूसरे देश की जाँच एजेंसियों से पता चलता है।
वैसे प्रधानमंत्री की बात पर यकीन करने का मन तो नहीं करता मगर जब पङोस में रहने वाली औरतों का ख्याल आता है तो यकीन न करने की कोई गुंजाईश भी नहीं रहती।