रविवार, 17 जनवरी 2010

राजनीति में एक अध्याय का अंत


दशक के अंतिम साल कि सबसे दुखद घटना। माकपा के सबसे वरिष्ठ नेता ज्योति बसु नहीं रहे। इनके बारे में अभी कुछ लिखने का दिल नहीं कर रहा क्योंकि आंखे आंसुओं से भीगी हैं और दिल व्यथित। चर्चा अगली बार करेंगे।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

हमारी व्यवस्था जिन्हें इडियट्स कहती है...


समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते हैं किसी का अर्थविस्तार तो किसी का अर्थसंकोच। आज कोई जब बुद्धिजीवी बोलता है तो एक ऐसी छवि बनती है जिसमें पर्याप्त जटिलता, कुटिलता तथा बने बनाए रास्तों पर चलने वाले मुसाफिर जैसे गुण हों। वहीं इडियट का अर्थविस्तार हो गया है। दरअसल यह अर्थविस्तार आश्चर्यचकित नहीं करता है क्योंकि हमारी व्यवस्था कुछ निर्धारित मानदंडो के आधार पर ही लोंगो को इडियट घोषित करती है। लेकिन ये मानदंड कितने विवेकशील हैं महत्वपूर्ण बात यह है।
जिसे हम इडियट कहते हैं उसमें एक किस्म का पागलपन होता है, चीजों को खारिज करने का माद्दा होता है। जिसे हम पागलपन कह रहे हैं वही व्यक्ति को रचनात्मक बनाता है और खारिज करने का माद्दा, मौलिक । यह रचनात्मकता और मौलिकता स्थापित मानदंडो को चुनौती देती है जिसे लोग डाइजेस्ट करने में असहज महसूस करते हैं। लोगों को लगता है कि यह बहक गया है और तमाम तरह की चाबुकें लगायी जाने लगती हैं। उत्तर आधुनिक विचारधारा इसी चाबुक को खारिज करती है और पागलपन को पर्याप्त स्पेस देती है, पनपने के लिए।
राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ इन्हीं चाबुकों को चुनौती देती है तथा पागलपन को परिपक्व होने तक उचित माहौल। रणछोड़ दास ( आमिर खान ) जीवन के स्टीरोयोटाइप आपाधापी के रण को छोड़ता है न कि अपनी मौलिक रचनात्मक और नवयुवा सुलभ जिज्ञासाओं और कौतुहलों के रण को। वह ज्ञान की जटिलताओं में नहीं उलझता है बल्कि मानवीय गतिविधियों से ही ज्ञान को आत्मसात करता है। रणछोड़ दास खुद को समझता है कि उसकी असली और मौलिक शक्ति क्या है? उसे हमारी शैक्षणिक व्यवस्था का अप्रासांगिक और गैररचनात्मक दबाव कतई पसंद नहीं है। वह अपने दोस्त राजु (शरमन जोशी ) और फरहान (आर माधवन) को भी असली क्षमता से रूबरू करवाता है। राजू एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार का हिस्सा है। एक तरफ वह परिवार की आर्थिक मजबूरी के कारण तथा दूसरी तरफ अप्रासंगिक हो चुकी शैक्षणिक व्यवस्था के अमानुषिक दबाव के कारण खुल कर कुछ नहीं कर पाता है।
फरहान की रूचि तथा दक्षता फोटोग्राफी में है जबकि माता-पिता उसे इंजीनियर बनाने पर तुले हैं। फरहान फिल्म में एक जगह कहता है कि ‘साला मुझसे किसी ने पूछा तक नहीं कि तुम्हें क्या बनना है?’ क्या हमारे समाज में यह स्थिति नहीं है कि बच्चे के जन्म लेते ही अभिभावक डॉक्टर, इंजीनियर बनाने का दबाव बनाने लगते हैं। आज हमारे समाज में यह हकीकत है कि बच्चों से अभिभावकों की अपेक्षाएं आसामान छूती हैं। इनकी अपेक्षाओं को एक हद तक उनकी मजबूरियों से जस्टीफाई कर सकते हैं, लेकिन यह बच्चों पर कहर बनकर टूटती है। उनका बचपना, मौलिकता और रचनात्मकता समय के साथ कुंद होते जाते हैं और अंततः भेड़ चाल में शामिल हो जाते हैं।
चूंकि सिनेमा एक दृश्य माध्यम है इसलिए यहां संवाद से ज्यादा दृश्य और भंगिमाओं की मांग होती है। य़दि 44 साल के आमिर खान इस फिल्म में 22 साल के रणछोड़ दास के चरित्र में पूरी तरह से फिट बैठते हैं तो अपनी भंगिमाओं के कारण। आमिर खान एक काबिल अभिनेता हैं जो इससे पूर्व की फिल्में ‘तारे जमीं’ पर और ‘लगान’ में अपनी काबिलीयत दिखा चुके हैं।
निर्देशक राजकुमार हिरानी अब तक ‘थ्री इडियट्स’ सहित तीन फिल्में बना चुके हैं- ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ और ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ इससे पहले की दो फिल्में हैं। दोनों अपने आप में कामयाब और काबिलेतारीफ। ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ और ‘थ्री इडियट्स’ भारतीय एजुकेशन सिस्टम को कटघरे में खड़ी करती हैं और कई सवाल छोड़ जाती हैं जिसका जबाव अब तक हमारी व्यवस्था के पास नहीं है। राजकुमार हिरानी कहते हैं कि ‘थ्री इडियट्स’ केवल शैक्षणिक व्यवस्था की विसंगतियों पर ही नहीं बल्कि अभिभावकों की गैर वाजिब अपेक्षाओं की भी खबर लेती है।
‘थ्री इडियट्स’ को देखते हुए आमिर खान की ‘तारे जमीं पर’ फिल्म बरबस याद आती है, लेकिन जल्दी ही पता चल जाता है यह फिल्म उच्च शिक्षा को कटघरे में लाती है जबकि ‘तारे जमीं पर’ प्राथमिक शिक्षा को। हिरानी ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ के माध्यम से दर्शकों को जादू की झप्पी दिलाते हैं तो ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ के माध्यम से नए संदर्भ में गांधीगिरी को परोसते हैं वहीं ‘थ्री इडियट्स’ के माध्यम से आल ईज वेल की मौलिक परिकल्पना पेश करते हैं। यह फिल्म बड़े जोरदार तरीके से बताती है कि किताब से ज्ञान नहीं मिलता है बल्कि ज्ञान से किताबें लिखी जाती हैं।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

मूल्यविहीन होती शिक्षा प्रणाली


हाल के दिनों में शिक्षा को लेकर हर तरफ काफी हो-हल्ला मचाया जा रहा है, शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों की सलाह पर अमल करने की बात कही जा रही है। ऐसा प्रतित हो रहा है मानो अचानक से कोई संजीवनी हाथ लग गई हो! भारत में जिस शिक्षा प्रणाली को प्रसारित और प्रचलित किया जा रहा है उसके कई पक्षों में सुधार करने की आवश्यकता है। मसलन हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली और उसकी व्यवस्था में इतनी खामियाँ व्याप्त है कि उसे दूर किए बगैर किसी नए सुधार की बात करना ठीक उसी तरह होगा जैसे किसी एक मर्ज का इलाज किए बगैर नए मर्ज की दवा ढ़ूँढ़ने में लग जाना। आज हमारे नीति-निर्धारक शिक्षा व्यवस्था में जिस सुधार की बातें करते नहीं अघाते हैं उसमें व्यवसायिकता इतनी हावी होती जा रही है कि भेदभाव, महिला हिंसा, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे समाज के गंभीर मुद्दों पर बात करने का समय ही नहीं है। यह सभी बातें जैसे दोयम दर्जे की बनकर रह गई हैं। नतीजतन बच्चों को घरों में माता-पिता से समय के अभाव के कारण बात करने का मौका नहीं रहता और स्कूलों में पढ़ाई का बोझ किसी को भी इस ओर सोचने की फुर्सत ही नहीं देता। भारी-भरकम सिलेबस का दबाव, परीक्षा, अंकों और डिवीजन की चूहा-दौड़ में चाहे-अनचाहे व्यक्तित्व के विकास की बहुत सी समस्याएं अनसुलझी रह जाती हैं। यह दबाव निराशा, भावनात्मक कमजोरियों, अपराधों के रूप में फूटता है जिसकी वजह से बच्चों में नशाखोरी, आत्महत्या जैसे अपराधिक प्रवृत्तियां बढ़ती जा रही हैं।
समस्या सिर्फ सिलेबस की ही नहीं है, यह तो समस्या का सिर्फ एक पहलू है। प्राथमिक और उच्च शिक्षा दोनों की हालत आज खस्ताहाल बनी हुई है। प्राथमिक शिक्षा का तो यह आलम है कि शिक्षकों की जगह ऐसे अप्रशिक्षित लोगों के हाथों में बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेवारी दी जा रही है जो न तो मानक योग्यता रखते हैं और न शिक्षण कार्य में उनकी रुचि या प्रतिबद्धता है । शिक्षक जिसे कभी गुरु कह कर सर्वोच्च पदवी दी जाती थी अब वह कहीं पर शिक्षा-मित्र तो कहीं कांट्रेक्ट-टीचर के उप नामों से जाना जाता है । एक तरफ तो प्राथमिक शिक्षा का धड़ल्ले से निजीकरन कर बड़े शहरों में स्कूलों को आलीशान होटलों की तर्ज पर ढ़ाला जा रहा है जहाँ पढ़ाई से ज्यादा विलासिता पर खर्च किया जाता है। दूसरी तरफ गांवो, छोटे-शहरों और कस्बों के सरकारी स्कूलों की शिक्षा पर निर्भर बच्चों को जमीन पर बैठने के लिए दरी तक नसीब नहीं होती। बात सिर्फ प्राथमिक शिक्षा की बदहाली की नहीं है, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तो विषमता की खाई और गहरी हो चुकी है। हमारे पास तथाकथित ‘गर्व’ करने के लिए आई.आई.टी और एम्स जैसे संस्थान तो हैं मगर इनकी संख्या ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ के समान है। हमारे यहाँ बंगलुरू जैसे शहरों में हर गली-नुक्कड़ पर थोक के भाव में इंजीनियरिंग कॉलेज खुल चुके हैं जहाँ के पढ़ाई के स्तर की सिर्फ कल्पना हीं की जा सकती है। आर्थिक उदारवाद के इस दौर में आज देशभर में शिक्षा की दुकानें खुल गई हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों की नीतियां सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को तिरष्कृत कर निजी स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा देने वाली हैं । निजी स्कूलों को दिए जा रहे बढावों और महिमा-मंडन से शिक्षा आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही है। सरकार गुणवत्ता बढ़ाने के नाम पर निजी शिक्षण-संस्थानों को बढ़ावा तो देती है लेकिन सरकारी संस्थानों को उनकी जीर्ण-शिर्ण अवस्था में हीं रेंगते रहने देती है। हमारी विश्वविख्यात नालंदा और तक्षशिला की परंपरागत शैक्षिक प्रणाली धवस्त होती जा रही है और आगे की पीढियों को सिर्फ पेशेवर कर्मी बनाने की बात की जा रही है ना कि जिम्मेवार नागरिक।

बुधवार, 25 नवंबर 2009

मेरे देश की जाँच एजेंसियाँ


मेरे घर के आस-पास कुछ औरतें अर्थात आँटियां रहती है। जिनका एक ही काम है। कौन किसके घर में आ-जा रहा है, किसके घर में क्या नया समान आया है, कौन क्या कर रहा है अर्थात अपने आस-पङोस की हर हलचल का इन्हें पता होता है। और हाँ, खुद की बुराईयों पर पर्दा डालना ये औरतें कभी नहीं भूलती।
ऐसा ही कुछ हाल हमारी खूफिया एजेंसियों का भी है। अमरीका जाने से पहले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं ने एक बयान में कहा था कि उन्हें आए दिन भारत की खूफिया जाँच एजेंसियों से यह सूचनाएँ मिल रही है कि पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी भारत में 26/11 जैसा एक और हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। यह खबरें प्रधानमंत्री को उन्हीं खूफिया एजेंसियों से मिली है जो 26/11 के हमले के बारे में कुछ भी बताने में नाकाम रही थी। यही नहीं, 26/11 की साजिश रचने वाले तव्वहुर राणा और डेविड हेडली नकली पासपोर्ट पर भारत भ्रमण करते रहे, दोस्त बनाते रहे और एक दिन भारत को दहला कर चले गए। मगर तब भी हमारी यही खूफिया एजेंसीयाँ घोङे बेच कर सोती रही। वह तो भला हो अमरीका की जाँच एजेंसी एफ.बी.आई का जिसने 26/11 की जाँच को फिर से नई दिशा दी वरना इस हादसे की पहली बरसी पर भी हमारी जाँच एजेंसियाँ कसाब को लेकर घिसतटी रहती और जाँच चितंबरम द्वारा पाकिस्तान पर आरोप लगाने और पाकिस्तान द्वारा उनको खारिज करने पर अटकी रहती।
भारत की जाँच एजेंसियों में शुरू से ही तालमेल की कमी रही है। जब कोई हादसा हो जाता हे तो एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाती है और फिर जाँच शुरू की जाती है। तब लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं होता। भारतीय जाँच एजेंसियाँ अभी तक भारत में हुए ज़्यादातर बम धमाकों की जाँच ही कर रही है। दोषियों को सज़ा दिलाना तो दूर की बात है। वैसे भारत की अपनी तरह की पहली जाँच एजेंसियाँ है जिसे दूसरे देश में हो रही हर हरकत की जानकारी है मगर खुद के देश में क्या हो रहा है, उन्हें दूसरे देश की जाँच एजेंसियों से पता चलता है।
वैसे प्रधानमंत्री की बात पर यकीन करने का मन तो नहीं करता मगर जब पङोस में रहने वाली औरतों का ख्याल आता है तो यकीन न करने की कोई गुंजाईश भी नहीं रहती।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

लुट गयी ये ज़मीं, लुट गया आसमां

कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कभी नहीं भरते हैं। वक़्त इन घावों पर मरहम लगाकर इनकी टीस कुछ कम करने की कोशिश जरूर करता है लेकिन दर्द की स्मृतियों को भुला पाना क्या इतना आसन होता है? भारत-पाकिस्तान विभाजन का घाव तो पूरे देश को मालूम है लेकिन इस घाव का असली दर्द तो इनको झेलने वाले ही जानते हैं। शायद इसी दर्द को बयां करती है असगर वजाहत द्वारा लिखित नाटक "जिस लाहौर नई देख्या ओ जम्या ही नई"।

असगर वजाहत लिखित इस नाटक के बीस साल पूरे होने पर श्रीराम सेंटर में इसका विशेष प्रदर्शन किया गया। गौरतलब है की आज से बीस साल पहले हबीब तनवीर ने इसी रंगमंडल के साथ इस नाटक को पहली बार मंचित किया था। यह नाटक एक उर्दू पत्रकार के यात्रा संस्मरण से प्रेरित है जिसमें भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय लाहौर में अकेली बच गयी एक हिन्दू बुढ़िया की दास्तान है। विभाजन और अपनी जमीन से अलग होने का दर्द नाटक के केंद्रबिंदु हैं और धर्म, उन्माद, और भाईचारे का धीरे-धीरे अंकुरित होता बीज इसके आसपास घूमते अनेक ध्रुव। वैसे ध्रुव जिनका मिलन कहीं सुखद है तो कहीं अत्यंत दुखद। यह केंद्रबिंदु और इसके विभिन्न ध्रुवों को मिलाकर एक ऐसी कथा का निर्माण होता जो इतिहास के संभवतः सबसे बड़े विस्थापन का जीवंत चित्र उकेरने में कामयाब होती है।

विभाजन पर चाहे 'कितने पाकिस्तान', 'गर्म हवा', 'पिंजर' या फिर 'तमस' किसी की बात की जाए तो फिर भी 'जिस लाहौर नई देख्या' को देखने का अपना अलग ही अनुभव है। माई की भूमिका में शोभा वर्मा, पहलवान के अभिनय में अतुल जस्सी और नासिर काज़मी के चढ़ते -उतरते संवादों और अभिनय के जरिये आप लगभग दो घंटे तक बिलकुल मंत्रमुग्ध से बैठे रहेंगे। कहानी में मानवीय संवेदनाओं, धर्म की अधूरी समझ के कारण उपजी धर्मान्धता और अपने मूल जड़ से कटने की व्यथा को चंद घंटों में बांधने में यह नाटक बिलकुल सफल हुआ है। नासिर काज़मी के हालात के अनुसार नाटक में बोले गए शेर मानवीय अंतर्द्वंद के कई अनछुए पहलुओं को बड़ी खूबसूरती के साथ तराशकर बाहर निकालते हैं। विषय पूरी तरह गंभीर है लेकिन कहीं-कहीं हास्य रस वातावरण को बोझिल होने से बचाता है।

यह नाटक वर्तमान सन्दर्भ में हमसे कई सवाल पूछता हुआ सा मालूम पड़ता है। मसलन, क्या धर्म के आगे मानवता की तिलांजलि देना उचित है। अलग-अलग धर्म क्या सिर्फ उसी एक महान सत्ता को नहीं मानते जो अमूर्त है। अपने मूल जड़ों से कटकर क्या आदमी ज्यों का त्यों बना रह सकता है और सबसे अहम् सवाल की क्या विभाजन की त्रासदी को भूलकर हम मिलकर नहीं रह सकते और सभी धर्मों से बढ़कर क्या कोई ऐसा धर्म नहीं है जिसमे सभी बराबर हो। हाँ एक धर्म ऐसा है, और वो है मानवता का धर्म। चलते-चलते एक गाना याद आ रहा है " पंछी नदियाँ पवन के झोकें, कोई सरहद ना इन्हे रोके"।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

पहले पैमाना तो निर्धारित करें कपिल सिब्बल

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठने के लिए बारहवीं कक्षा में कम से कम 80 प्रतिशत अंक लाने की बात कहकर एक नई बहस को जन्म दिया है। हालांकि अपनी कही बात पर इतनी तीखी प्रतिक्रियाएँ आने पर उन्होने झट से सफाई भी पेश कर दिया। अपनी बात को बदलते हुए उन्होनें कहा है कि विशेषज्ञों की समीति अच्छी तरह विचार करने के बाद यह तय करेगी कि न्यूनतम अंक क्या होंगे? कपिल सिब्बल के अनुसार ऐसा करने से छात्र 12वीं की बोर्ड परीक्षा को गंभीरता से लेंगे और आईआईटी के साथ अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कोचिंग संस्थानों पर अंकुश लगेगा । विद्यार्थियों को नंबरों की अंधी दौड़ से बचाने के लिए दसवीं में ग्रेडिंग सिस्टम लाए जाने पर तमाम तरह के तर्क दिए गए थे और इस कदम पर वाहवाही भी लूटी गई थी पर आईआईटी प्रवेश परीक्षा के मामले में वो सारी बातें क्यों भुला दी गईं? एक तरफ तो हम 10वीं के छात्रों को नंबरों की अंधी दौड़ से बचाना चाहते हैं, दूसरी तरफ 12वीं के छात्रों को इसी दौड़ में क्यों झोंक रहे हैं? देश भर में इसके विरोध में स्वर उठने लगे हैं, खासतौर से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के छात्र और शिक्षा से जुड़े लोग इस प्रस्ताव से आगबबूला हैं।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 80 प्रतिशत या इससे अधिक अंक लाने वाले विद्यार्थियों को उंगलियों पर गिना जा सकता है क्योंकि इन राज्यों में 12वीं की परीक्षा का स्तर बहुत कठिन होता है और 12वीं के साथ 11वीं के प्रश्न भी पूछे जाते हैं। दूसरी तरफ सीबीएसई में थोक के भाव में 80 प्रतिशत से ऊपर अंक लाने वाले छात्र मिल जाते हैं । वैसे भी जब देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग बोर्ड हैं और पाठ्यक्रम में भी आकाश और पाताल का अंतर है तब 80 प्रतिशत अंकों का ऐसा फरमान थोपना समझदारी तो नहीं ही कही जा सकती है। इन बे सिर-पैर की बातों और अंकों की इस अँधी दौर में गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थि पीछे छूटते जाएँगे और उनकी प्रतिभा का कोई मोल नहीं रह जाएगा।
सरकार आईआईटी और इसी स्तर के सभी केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्ग के छात्रों को आरक्षण देती है मगर 80 प्रतिशत अंकों की बाध्यता का प्रभाव क्या उन लोगों पर नहीं पड़ेगा? लाखों विद्यार्थियों का आईआईटी में जाने का सपना चकनाचूर हो जाएगा। ऐसे विद्यार्थि जिनके पास अपनी कड़ी मेहनत के अलावा न तो सीबीएसई बोर्ड जैसी चमक-धमक होती है और ना ही उतनी सुविधाएँ। अगर विद्यार्थि इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य पेशेवर शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए कोचिंग संस्थानों की शरण में जाते हैं तो यह शिक्षा व्यवस्था की खामी का परिणाम है। आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की गुणवत्ता को बनाए रखना जरूरी है मगर साथ ही यह सुनिश्चित करना भी सरकार का ही दायित्व है कि इसमें प्रवेश पाने वाले समाज के सभी वर्गो से हों। किसी एक परीक्षा के आधार पर योग्यता को मापना उचित नहीं है।
अगर इस तरह का कोई काम करना भी है तो इसे निष्पक्ष रूप से तभी किया जा सकता है जब सभी राज्यों में एक ही बोर्ड हो उनके पाठ्यक्रम में समानता हो और शिक्षा में बराबरी हो । तभी ऐसी शर्त को उचित ठहराया जा सकता है वरना तो इससे एक साजिश की बू आती रहेगी जहाँ विकास से वंचित और पिछड़े तबके को और पीछे धकेलने की तैयारियाँ चल रही है।

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

एम्स बन गया है विदेशी मरीजों का डॉक्टर


अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान यानि ‘एम्स’ भारत में स्वास्थय जगत का सबसे प्रतिस्ठित नाम है। यहाँ डॉक्टरी की शिक्षा में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों पर सरकार लगभग 98 लाख से लेकर 170 लाख तक खर्च करती है लेकिन ये पैसा भारत से ज्यादा विदेशी मरीजों की सेवा में लग रहा है। एक सर्वे के अनुसार इस संस्थान से डॉक्टर बनकर निकलने वालों में से 54 प्रतिशत विदेशी मरीजों की नब्ज देखना पसंद करते हैं।
लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में केंद्रीय स्वास्थय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने यहाँ विद्यार्थियों पर हो रहे खर्च का ब्योरा तो दिया मगर यहाँ डॉक्टरों में बढ़ी विदेशी पसंद पर कुछ भी नही कहा। भारतीय छात्रों के प्रतिभा पलायन का ये कोई इकलौता उदाहरण नही है। चाहे वो इंजीनियरिंग के छात्र हों या डॉक्टरी के, भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों से शिक्षा लेकर ये लोग विदेश का रूख करना पसंद करने लगे हैं। इस बात की दुहाई दी जाती है कि भारत में प्रतिभावान इंजीनियारों, वैज्ञानिकों, डाक्टरों आदि को उनकी योग्यता के अनुकूल काम करने की सुविधाएँ और स्थितियाँ नहीं मिलतीं, लिहाजा वे विदेशों की ओर रूख करने को बाध्य होते हैं। लेकिन ये सच्चाई का एक ही पहलु है, ये लोग अधिक से अधिक सुख-सुविधाओं की खोज में विदेशी बनकर रहना पसंद करते हैं।
विश्व स्वास्थय संगठनके अनुसार 100 लोगों की जनसंख्या पर एक डॉक्टर होना चाहिए मगर हमारे देश में ये अनुपात दस हजार पर एक डॉक्टर का है। एक तो देश में अच्छे अस्पतालों के अभाव के कारण एम्स जैसे संस्थानों में मरीजों की इतनी मारामारी होती है कि दूर-दराज से आए लोगों को कई दिनों तक खुले आसमान को ही छत बनाना पड़ता है ऊपर से डॉक्टरों की कमी से इनपर दोहरी मार पड़ती है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सरकार जब यहाँ इतना पैसा बहाती है तो वो यहाँ की जनता के काम क्यों नहीं आता? इससे बड़ा सवाल ये है कि क्यों नहीं देश के तमाम भागों में ऐसे संस्थान बनाए जाते हैं ताकि इन संस्थानों पर इतना बोझ ही ना पड़े? इसके अलावा ऐसे मानदंड भी बनाए जाने की जरूरत है जिससे इन लोगों के पलायन पर रोक लगाई जा सके। जब देश का इतना पैसा इनकी पढ़ाई पर खर्च होता है तो इन्हें भी अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।