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सोमवार, 1 जून 2009

प्रयोग या परिणाम?

मीरा कुमार को लोकसभा का अध्यक्ष बनाकर भारत के संसदीय इतिहास में एक नई इबारत लिख दी गई है। १५वीं लोकसभा, २००९ का चुनाव जहाँ कांग्रेस के लिए एक नया उत्थान सन्देश लेकर आया वहीँ संसदीय राजनीति का चेहरा भी प्रकाशवान हुआ है। मीरा कुमार के रूप में पहली बार किसी महिला को लोकसभा अध्यक्ष का पद सौंपा गया है। पिछले लोकसभा के अध्यक्ष, सोमनाथ चटर्जी का कार्यकाल अंतिम दिनों में जिस तरह बीता, उसको भुलाने और उसपर मरहम लगाने में शायद यह प्रसंग कुछ काम करे। इंदिरा गाँधी, प्रतिभा पाटिल और किरण बेदी के बाद एक बार फिर नारी सशक्तिकरण का उभार दिखा है। यधपि किरण बेदी का संसदीय राजनीति से जुडाव नहीं था लेकिन उनको इस लीग में शामिल करने का मेरा अपना मत है।

राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर काफी बहसें हो चुकी हैं। १५ वीं लोकसभा का चुनाव इस मामले में भी ऐतिहासिक साबित हुआ कि संसदीय राजनीति में महिलाओं कि संख्या आखिकार ५० को पार कर गयी। इस बार कुल ६१ महिलाएं संसद में होंगी। तो क्या सचमुच भविष्य में, संसदीय राजनीति में इनकी प्रभुत्व में इज़ाफा होगा? क्या राजनीतिक पार्टियाँ और जनता इस ग्राह्यता के लिए तैयार हैं? इसी सिक्के के दूसरे पहलु पर गौर करते हैं। इस बार कुल चार सौ उनसठ महिलाएं उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुई थीं जिसमे सिर्फ ६१ को ही सफलता मिली। यह आंकड़ा थोड़ी देर को सोचने पर मजबूर भी करता है कि क्या कारण है कि जनता ने बाकी तीन सौ अनठानवे को नकार दिया? क्यों इतने कम स्तर पर सफलता मिली। तो क्या हमें मान कर चलना चाहिए कि लोकतंत्र इस परिवर्तन के लिए इतनी जल्दी तैयार नहीं है? या फिर की आंकड़ें ही सबकुछ नहीं बताते.

एक अनुमान के मुताबिक ग्राम समिति से लेकर लोकसभा तक कुल अड़तीस लाख उम्मीदवार हैं लेकिन इनमें महिलाओं की संख्या लाख दो लाख से ज्यादा नहीं है। इनकी भागीदारी का प्रतिशत हुआ महज़ तीन के आस-पास। संसदीय राजनीति की बात करें तो ५४३ में ६१ उम्मीदवारों का प्रतिशत ११ के आस-पास है। पहले वाले के मुकाबले यह ज्यादा जरूर है लेकिन संतोषजनक नहीं। यह भी उसी लोकतंत्र (बराबरी का?) की विडम्बना है जहाँ बीस बड़े उद्योग घराने देश की जीडीपी के बीस प्रतिशत भाग पर कुंडली मारे बैठें हैं और चौरासी करोड़ लोगों को बीस रुपया प्रतिदिन भी नहीं मिलता है। महिला आरक्षण विधेयक को ही देखिए जो देवगोड़ा के समय से ही लटका पड़ा है। हमेशा इसे या तो पिछले दरवाजे (राज्यसभा) से लाया जाता है या संसद सत्र के ख़त्म होने के समय पर। अब ऐसे में मीरा कुमार का उदाहरण नारी सशक्तिकरण के रूप में कितना कारगर सिद्ध होगा यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा।

लोकतंत्र अन्य सभी शासन प्रणालियों से बेहतर है क्योंकि यह प्रयोगों का घर है। ये प्रयोग इसे जड़ होने से बचाते हैं और इसकी बनाई हुई आस्थाओं को मजबूत करतें हैं। मीरा कुमार का उदाहरण भी इस सन्दर्भ में प्रासंगिक है। परिवारवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, धर्मवाद और क्षेत्रवाद के बाद यह एक और सफल प्रयोग है। वैसा ही प्रयोग जैसा मुस्लिमों के साथ होता रहा है। जगजीवन बाबू की बेटी और दलित होना उनके लिए ज्यादा अनुकूल हुआ। बहुजन के लिए कांग्रेस का यह एक बड़ा सन्देश भी है और महिलाओं के लिए तो है ही। वैसे भी संसदीय राजनीति की यह पहचान रही है की परिवर्तन के लिए कुछ ऐसे तत्त्व जरूर होने चाहिए जो जनता के जेहन से जल्दी विस्मृत नहीं हों।

मीरा कुमार और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर कांग्रेस का दृष्टिकोण चाहे जो भी हो लेकिन पार्टी ने संसदीय राजनीति में मील का पत्थर तो स्थापित किया ही है। अब पार्टी को चाहिए की वह महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाकर एक और मील का पत्थर स्थापित करे और लोकतंत्र को शुभ संकेत दे। इस बार लालू और मुलायम का दबाव भी नहीं है। इन्होनें तो मंडल की मलाई खूब खाई लेकिन बराबरी की बात पर फटाक से उल्टी कर देते हैं। खैर! जनता ने जिस भाव से प्रेरित होकर जनादेश दिया है उसका सकारात्मक उत्तर देना कांग्रेस का कर्तव्य होना चाहिए। मीरा कुमार के बहाने एक शुभ संकेत तो मिल ही चुका है, कांग्रेस को कोशिश करनी चाहिए की मीरा कुमार एक प्रयोग मात्र बनकर न रह जाएँ बल्कि उनकी तरह और परिणाम सामने आएं। प्रयोग परिणाम की सीढ़ी होनी चाहिए एक छलावा नहीं।

रविवार, 19 अप्रैल 2009

लोकतंत्र में 'जूता'

कहते हैं जब आदमी हर जगह से निराश हो जाता है तो भगवान को याद करता है। उनसे मदद मांगता है न मिलने पर उन्ही को कोसता भी है। लेकिन अब लोगों ने भगवान को छोड़कर जूते का सहारा ले लिया है। चारों तरफ दनादन जूते बरसें, अभी बरस रहे हैं, और मौसम देखकर लग रहा है की बरसते ही रहेंगे। इसके संस्थापक या कहे की पितामह का दर्ज़ा
मुन्तज़र-अल-ज़ैदी
को दिया जाना चाहिए जिन्होंने पहली बार में ही ऐसा बेंचमार्क स्थापित किया की दुनिया दंग रह गयी। पहले तो लोग भौच्चके रह गए परन्तु हमेशा की तरह इस मीडिया प्रयोग को भी अपना लिया। फिर क्या था, 'बेन जिआबाओ, अरुंधती रॉय, पी. चिदंबरम और अब आडवानी' भी इस नए प्रयोग के दायरे में आ गए।

जूते के इन प्रकरणों से कुछ गंभीर सवाल निकलते हैं जिनपर विचार करना बहुत जरूरी है।

पहली बात यह की क्या कारण है की हर बार जूता निशाने से चूक गया? यह सवाल इसलिए भी अहम है की अगर कोई १०-२० फ़ुट की दूरी से जूता मारे और हर बार निशाना चूक जाये तो थोड़ा अटपटा सा लगता है। तो क्या इस जूता चलाने के पीछे सिर्फ सम्बंधित लोगों को आगाह मात्र करना था? वैसे हमे यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह 'पगड़ी उछालने' का अर्थ बहुत व्यापक होता है ठीक वैसे ही इस 'जूता फेंको' क्रांति का अर्थ बहुत बड़ा और गंभीर है।

सबसे पहला कारण तो निश्चित तौर पर असंतोष ही है। बुश कि इराक नीतियों से जनता आहत थी जिसका प्रतिनिधित्व मुन्तज़र-अल-ज़ैदी ने किया, अरुंधती रॉय के लेख से एक बड़ा तबका असहमत था जिसका प्रतिनिधित्व 'युवा' संगठन के एक नौजवान ने किया, सिख दंगों में न्याय नहीं मिलने से पूरा सिख समुदाय आहत था जिसका प्रतिनिधित्व जनरैल सिंह ने किया और बीजेपी पार्टी में फैले एक व्यापक असंतोष का प्रतिनिधित्व पावस अग्रवाल ने किया।

वस्तुत लोकतंत्र में फैलती गहरी असमानता, तंत्र से 'लोक' को अलग करने कि साज़िश और समाज में फैलते असुरक्षा के भाव ने लोगों को जड़ तक आहत और आक्रोशित किया है। इस आक्रोश का सैलाब मुंबई हमलों के बाद फूट पड़ा जिसका नेतृत्व भले ही खाते-पीते मध्यवर्ग ने किया परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से इसमें सबकी भागीदारी रही। लोकतंत्र का 'लोक' अब ऐसे मुहाने पर आ खड़ा है जहाँ से वो अब सिर्फ कड़े फैसले ही लेगा।

एक बात और आडवाणी पर जो जूता चला वो और मामलों से बिलकुल अलग रहा। जहाँ पार्टी ही सर्वेसर्वा हो, वहां पार्टी के ही एक कार्यकर्ता द्वारा,पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर जूता फेंकना बिल्कुल नई घटना है। पार्टी को मानने और उसकी विचारधारा को ग्रहण करने में सालों का वक़्त लगता है, फिर क्या बात रही की सालों की यह विचारधारा एक जूते के तले सिमट गयी। सवाल सचमुच बहुत गंभीर है।

'भारतीय लोकतंत्र में जूता' महज असंतोष, क्रोध और क्षोभ का ही सूचक नहीं है। यह दिखाता है की जब लोकतंत्र के पहरेदार, 'लोक' को भूलकर, केवल सूने तंत्र की बात करेंगे तो लोक को आखिरकार संकेतों के रूप में जूते ही चलाने पड़ेंगे। ये शायद सीधे-सीधे नहीं लगेंगे लेकिन मीडिया कवरेज से ऐसी मारक क्षमता विकसित करेंगे जिसकी अनुगूँज हर कोने में सुनाई देगी।

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

क़साब के बहाने कुछ सवाल

मुंबई हमलों के दोषी क़साब की तरफ से मुकदमा लड़ने के लिए नियुक्त वकील 'अंजलि वाघमारे' के घर पर जिस तरह पथराव किया गया, इससे कुछ सवाल निकलकर सामने आएँ हैं। गौरतलब है की वकीलों ने यह केस लड़ने से मना कर दिया था जिसके बाद विशेष अदालत ने इस केस में उन्हें
क़साब की तरफ से नियुक्त किया है। अपने घर पर हुए इस पथराव के बाद उन्होंने कहा है की उन्हें एक दिन का समय चाहिए, जिसमें वो यह फैसला कर सकें की वो यह केस लडेंगी या नहीं।

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और यहाँ पर सारी प्रक्रिया का संचालन लोकतंत्र के अनुसार होता है। न्यायपालिका इस लोकतंत्र की उच्चतम संस्था है, जो शायद अभी तक दागदार नहीं हुई है। परन्तु इस घटना ने हमारे लोकतंत्र के सामने एक प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह बहस अब होनी ही चाहिए की क़साब जैसे आतंकियों को वकील मिले या नहीं? निश्चित तौर पर क़साब घृणा का हकदार है और होना भी चाहिए,परन्तु क्या सिर्फ उसी घृणा के कारण हम अपनी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ही कुचल डालें? लोकतत्र में हर व्यक्ति को, चाहे वो अपराधी ही क्यों न हो, पूरा हक है की वह अपने बचाव में वकील रखे। फिर कसाब के लिए यह दुहरा पैमाना क्यों?

कुछ लोग यह सवाल कर रहें हैं की उसने देश की अस्मिता को चोट पहुचाई है, मुंबई नगरी को दो दिनों तक कैद सा कर दिया था, और सबसे बड़ी दरिंदगी की २०० लोगों की हत्या में वह शामिल है। इन सबके बावजूद क्या उसका केस लड़ना सही है? मै बोलूँगा जी बिलकुल उचित है। जब आपके पास उसके खिलाफ सारे सबूत हैं और आपको पता है की वो बचेगा नहीं तो फिर घबराने या उत्तेजित होने की कोई बात ही नहीं होनी चाहिए। यह लिख लीजिये की कोई भी वकील लाख कोशिशों के बावजूद उसे बचा नहीं पायेगा। अगर आप उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा देंगे तो भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका की छवि मजबूत ही होगी और वह पूरे विश्व समुदाय के लिए एक मिसाल कायम करेगी। सिर्फ भावनावों के आधार पर देश चलता तो फिर कहना ही क्या था! अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो फिर अपराधियों को जिन्दा पकड़ने की कोई जरुरत ही नहीं है। बस देखिये और मार दीजिये, परन्तु फिर बाद में मानवाधिकारों की दुहाई मत दीजियेगा।

उदाहरण के तौर पर निठारी कांड के अभियुक्तों, मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेन्द्र कोली को रखा जा सकता है। इनका अपराध भी बहुत संगीन था, शायद भारत में अपनी तरह का पहला केस था। इनका केस भी किसी वकील ने लड़ा(नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है) लेकिन फिर भी वो बच नहीं पायें। उन्हें मौत की सजा दी गयी जो बिलकुल सही है। उनका वकील न उन्हें बचा सकता था न बचा पाया। फिर कसाब के साथ ऐसा क्यों हो? मै भी चाहता हूँ की क़साब को सजा हो और वो भी मौत की। लेकिन हो तो कानून के तहत। जहाँ हमारी विधायिका और कार्यपालिका पहले ही दागदार हो चुकीं हैं वहां न्यायपालिका पर दाग न लगे तो ही बेहतर है।

बहरहाल, वाघमारे के घर पर जिन्होंने हमला किया(शायद शिवसेना के लोग) क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए की देश में सैकडों ऐसे नेता हैं जो प्रमाणिक तौर पर अपराधी हैं, फिर आप इनके खिलाफ़ क्यों नहीं कुछ करते? देश को इनके हाथों बर्बाद करवा रहें हैं और ये भी दीमक की तरह देश को चाटते जा रहें हैं। वहीँ जब महाराष्ट्र में बिहारियों पर हमला हुआ तो वे कहाँ सो रहे थे? आपने क्षेत्रवाद की गन्दी राजनीति की और एक मासूम का एनकाउन्टर कर काफी खुश हुए। क्या वो अपराध नहीं था? आप जब अपने ही भाई लोगों को मारेंगे तो दूसरा आपको क्यों न मारे? जब अपने ही घर में आग लगी हो तो बाहर वाले रोटियां सेकेंगे ही।

लोकतंत्र और सत्ता का यह खेल समय-समय पर खेला जाता रहा है और शायद खेला जाता रहेगा। लोगों को यह समझना होगा की न्यायपालिका का स्थान भावनाओं से ऊपर है और न्यायपालिका को भी इन भावनाओं की कद्र करते हुए क़साब को उचित सजा देनी होगी। निश्चित तौर पर वो सजा मौत से कम नहीं होनी चाहिए।