गुरुवार, 4 जून 2009

संसदीय राजनीति में 'बैठा'

लोकतंत्र अन्य सभी शासन प्रणालियों से बेहतर क्यों है? क्या जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा किया गया शासन ही इसकी श्रेष्ठता का उत्कृष्ट उदाहरण है। हर जन के लिए ग्राह्यता और निश्चित अवधि पर जनता के मताधिकारों का प्रयोग इसकी सर्वोच्चता को निश्चित ही सबलता प्रदान करते हैं। अब प्रश्न यह है की यह ग्राह्यता किस रूप में हो और जनता अपने अधिकारों का प्रयोग कैसे करे? अन्य प्रणालियों की तरह लोकतंत्र के भी अपने अंतर्विरोध हैं, होने भी चाहिए, लेकिन सवाल यह है की उन अंतर्विरोधों की सीमा क्या हो? हर जन की भागीदारी सुनिश्चित करने के पीछे कहीं लोकतंत्र के बने-बनाए हुए मूल्यों और आदर्शों पर तो कुठाराघात नहीं हो रहा है इसकी भी जांच जरूरी है।


झारखण्ड के पलामू संसदीय सीट से आखिरकार नक्सली नेता कामेश्वर बैठा संसद पहुचने में कामयाब हो ही गए। गौरतलब है की बैठा इससे पहले गढ़वा, पलामू और कैमूर आदि ज़िलों के ज़ोनल कमांडर रह चुके हैं। अब नक्सालियों के बारे में थोड़ी सी जानकारी रखने वाला शख्स भी जानता होगा की ज़ोनल कमांडर क्या चीज़ होता है। बहरहाल, उन्होंने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के टिकट पर जेल से ही चुनाव लड़ा और विजयी हुए। इन महाशय पर सौ से भी ज्यादा आपराधिक मामले हैं जिनमें भारतीय दंड संहिता की ३०२, १२४, ३०७, ३२४, ३२६ जैसी धाराएँ शामिल हैं। पलामू और आसपास के इलाके में 'बैठा' किसी परिचय (कुख्यात) के मोहताज़ नहीं हैं। फिर भी उन्हें एक लाख अडसठ हज़ार के आसपास वोट मिले और राजद के अपने निकट प्रतिद्वंदी और पिछले बार के सांसद 'घूरन राम' को उन्होंने तेईस हज़ार वोटों से हराया।


कहते हैं हर जनादेश कुछ कहता है। तो फिर यह जनादेश क्या कहता है? क्या लोकतंत्र को अपराधियों के प्रति अपनी ग्राह्यता बढ़ानी चाहिए या उन्हें हाशिये पर डालकर सबक सिखाना चाहिए। इन प्रश्नों पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार करना बहुत जरूरी है। इस बार कितने ही बाहुबली (मीडिया ने अपराधिक छवि वालों के कलंक को धोने के लिए अच्छा नाम दिया है) मैदान में थे लेकिन उनका हश्र क्या हुआ? जो नहीं लड़ सके उन्होंने घरवालों को लड़वाया लेकिन फिर भी बात नहीं बनी। चाहे वो हीना शहाब हों, वीणा सिंह हों या फिर मुख्तार अंसारी, साधु यादव और फिर अबू आज़मी। परन्तु क्या कारण है कि इसी जनादेश से नक्सलियों का एक ज़ोनल कमांडर उभरकर संसदीय राजनीति में अपनी पहचान बना लेता है। तो क्या जनता के लिए अपराधी और नक्सली में अंतर है या की पलामू की जनता का जनादेश खंडित और मूर्खतापूर्ण है। या फिर की इतना सबकुछ देखने के बाद भी नक्सली विचारधारा का प्रभाव लोगों के ज़ेहन से अभी उतरा नहीं है।


कहने वाले कह सकते हैं कि इस बार का चुनाव विकास के मुद्दे पर केन्द्रित था और हो सकता है घूरन राम इसमें फिसड्डी साबित हुए हों सो जनता ने बैठा पर विश्वास जताया है। अब जिसने कितने लोगों का खून बहाया है, सरकारी सम्पतियों का विनाश किया है और कितने ही पुलिस वालों को असमय काल के गाल में पहुचाया है उससे विकास की उम्मीद करना क्या बेमानी नहीं है? या हो सकता है भविष्य इसका बढ़िया फैसला करे लेकिन जनता ने आखिकार कितने ही अपराधियों के कार्यों का लेखा-जोखा तो देखा ही है जिन्होंने सत्ता का उपयोग विकास के लिए कम लेकिन अपनी दबंगता को चमकाने में ज्यादा किया है। वैसे भी बीजापुर, दंतेवाडा के नक्सली नेता 'रेंगम' यह बात कह ही चुके हैं कि हमारी सीधी लडाई सत्ता से है और सत्ता, सरकार में परिवर्तन ही हमारा मुख्य उद्देश्य है। तो क्या बैठा भी अपनी समानांतर सत्ता चलाएंगे? या फिर जैसे अमेरिका ने तालिबान को 'बढ़िया' और 'ख़राब' की श्रेणी में बांटा है वैसे हमें भी 'बढ़िया' और 'ख़राब' नक्सली का विभाजन करना होगा।


अब इसी लोकतंत्र और चुनावी राजनीति के दूसरे पहलु पर गौर करते हैं। जिसे दो साल या अधिक कि सज़ा नहीं हुई हों वह निर्विरोध चुनाव लड़ सकता है, संसदीय राजनीति में अपना सर ऊँचा कर शेर कि तरह दहाड़ सकता है लेकिन वहीँ दूसरी तरफ 'विनायक सेन' को दो साल जेल में सिर्फ इसलिए रखा जाता है क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर नक्सलियों कि मदद की। इसे भी छत्तीसगढ़ सरकार सिद्ध नहीं कर पाई। अब यह लोकतंत्र ही बताए कि एक डॉक्टर उस मरीज़ कि सेवा करे या नहीं जो अपराधी या नक्सली है। मारने वाला दोषी होता है या बचाने वाला? वहीँ दूसरी तरफ 'सलवा जुडूम' के नाम पर सैकड़ों आदिवासी मार दिए जाते हैं, विदर्भ के जिन लोगों का 'टाडा' रुपी घाव अभी सूखा भी नहीं हो वहां नक्सली और अपराधी चुनाव लड़ते हैं, संसद पहुचते हैं और सत्ता कि मलाई चाभते हैं। सरकार छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, बंगाल, बिहार, झारखण्ड आदि कई जगहों पर लाल झंडे का प्रकोप देख चुकी है और देख रही है। विचारधारा का अंत और समानांतर सरकार चलाने कि मंशा अब बच्चा-बच्चा जानता है। नेपाल का उदाहरण भी सामने ही है। ऐसे में लाल झंडे के साथ क्या किया जाए इसपर सोचने का वक़्त आ चुका है।


'बैठा' कि जीत के बाद 'अर्जुन मुंडा' ने कहा कि "इस तरह के उदाहरण लोकतंत्र को मजबूत करेंगे। अब तो इसका सीधा मतलब यह हुआ कि आप चाहे जितने कत्ल करें, दहशत फैलाएं लोकतंत्र कि संसदीय प्रणाली में आने से आपके सारे पाप धुल जायेंगे। तो क्या लोकतंत्र कि ग्राह्यता को बढाने, उसे मजबूत करने के लिए सैकड़ों जानों कि बलिदानी जरूरी है या कि दाउद इब्राहीम भी आकर चुनाव लड़ ले और गलती से जीत जाए तो इससे उसके सारे पाप धुल जायेंगे और लोकतंत्र मजबूत होगा। उन्होंने इसकी तुलना नेपाली व्यवस्था से कि है लेकिन उन्हें जानना चाहिए कि नेपाल के माओवादियों और यहाँ के नक्सलियों कि लड़ाई में बहुत अंतर है। यह इतिहास रहा है कि अपने किए पापों को छिपाने, उनकी करनी कि सज़ा पाने से बचने के लिए राजनीति एक महफूज़ जगह रही है। यहाँ कोई आपको जल्दी हाथ नहीं लगा सकता। अब इस लोकतंत्र और संसदीय राजनीति कि यह विडम्बना घातक रूप ले चुकी है जिसे सिर्फ जनता के भरोसे छोड़ना उचित नहीं है।


मै 'बैठा' या इस तरह के अन्य किसी व्यक्ति के लोकतंत्र कि मुख्यधारा में शामिल होने का विरोधी नहीं हूँ, और न ही संसदीय राजनीति में उनकी कार्यकुशलता को लेकर भयभीत, लेकिन मेरा मानना यह है कि इस तरह के सभी लोगों को उनके किए कि पूरी सज़ा मिले इसके बाद ही उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार हो। लोकतंत्र कि ग्राह्यता को बढाने के कुछ पैमाने होने चाहिए तभी यह सच्चे रूप में जनता का शासन बना रह पाएगा नहीं तो हमारे सामने साम्यवादियों का ज्वलंत उदाहरण है ही।

सोमवार, 1 जून 2009

प्रयोग या परिणाम?

मीरा कुमार को लोकसभा का अध्यक्ष बनाकर भारत के संसदीय इतिहास में एक नई इबारत लिख दी गई है। १५वीं लोकसभा, २००९ का चुनाव जहाँ कांग्रेस के लिए एक नया उत्थान सन्देश लेकर आया वहीँ संसदीय राजनीति का चेहरा भी प्रकाशवान हुआ है। मीरा कुमार के रूप में पहली बार किसी महिला को लोकसभा अध्यक्ष का पद सौंपा गया है। पिछले लोकसभा के अध्यक्ष, सोमनाथ चटर्जी का कार्यकाल अंतिम दिनों में जिस तरह बीता, उसको भुलाने और उसपर मरहम लगाने में शायद यह प्रसंग कुछ काम करे। इंदिरा गाँधी, प्रतिभा पाटिल और किरण बेदी के बाद एक बार फिर नारी सशक्तिकरण का उभार दिखा है। यधपि किरण बेदी का संसदीय राजनीति से जुडाव नहीं था लेकिन उनको इस लीग में शामिल करने का मेरा अपना मत है।

राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर काफी बहसें हो चुकी हैं। १५ वीं लोकसभा का चुनाव इस मामले में भी ऐतिहासिक साबित हुआ कि संसदीय राजनीति में महिलाओं कि संख्या आखिकार ५० को पार कर गयी। इस बार कुल ६१ महिलाएं संसद में होंगी। तो क्या सचमुच भविष्य में, संसदीय राजनीति में इनकी प्रभुत्व में इज़ाफा होगा? क्या राजनीतिक पार्टियाँ और जनता इस ग्राह्यता के लिए तैयार हैं? इसी सिक्के के दूसरे पहलु पर गौर करते हैं। इस बार कुल चार सौ उनसठ महिलाएं उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुई थीं जिसमे सिर्फ ६१ को ही सफलता मिली। यह आंकड़ा थोड़ी देर को सोचने पर मजबूर भी करता है कि क्या कारण है कि जनता ने बाकी तीन सौ अनठानवे को नकार दिया? क्यों इतने कम स्तर पर सफलता मिली। तो क्या हमें मान कर चलना चाहिए कि लोकतंत्र इस परिवर्तन के लिए इतनी जल्दी तैयार नहीं है? या फिर की आंकड़ें ही सबकुछ नहीं बताते.

एक अनुमान के मुताबिक ग्राम समिति से लेकर लोकसभा तक कुल अड़तीस लाख उम्मीदवार हैं लेकिन इनमें महिलाओं की संख्या लाख दो लाख से ज्यादा नहीं है। इनकी भागीदारी का प्रतिशत हुआ महज़ तीन के आस-पास। संसदीय राजनीति की बात करें तो ५४३ में ६१ उम्मीदवारों का प्रतिशत ११ के आस-पास है। पहले वाले के मुकाबले यह ज्यादा जरूर है लेकिन संतोषजनक नहीं। यह भी उसी लोकतंत्र (बराबरी का?) की विडम्बना है जहाँ बीस बड़े उद्योग घराने देश की जीडीपी के बीस प्रतिशत भाग पर कुंडली मारे बैठें हैं और चौरासी करोड़ लोगों को बीस रुपया प्रतिदिन भी नहीं मिलता है। महिला आरक्षण विधेयक को ही देखिए जो देवगोड़ा के समय से ही लटका पड़ा है। हमेशा इसे या तो पिछले दरवाजे (राज्यसभा) से लाया जाता है या संसद सत्र के ख़त्म होने के समय पर। अब ऐसे में मीरा कुमार का उदाहरण नारी सशक्तिकरण के रूप में कितना कारगर सिद्ध होगा यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा।

लोकतंत्र अन्य सभी शासन प्रणालियों से बेहतर है क्योंकि यह प्रयोगों का घर है। ये प्रयोग इसे जड़ होने से बचाते हैं और इसकी बनाई हुई आस्थाओं को मजबूत करतें हैं। मीरा कुमार का उदाहरण भी इस सन्दर्भ में प्रासंगिक है। परिवारवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, धर्मवाद और क्षेत्रवाद के बाद यह एक और सफल प्रयोग है। वैसा ही प्रयोग जैसा मुस्लिमों के साथ होता रहा है। जगजीवन बाबू की बेटी और दलित होना उनके लिए ज्यादा अनुकूल हुआ। बहुजन के लिए कांग्रेस का यह एक बड़ा सन्देश भी है और महिलाओं के लिए तो है ही। वैसे भी संसदीय राजनीति की यह पहचान रही है की परिवर्तन के लिए कुछ ऐसे तत्त्व जरूर होने चाहिए जो जनता के जेहन से जल्दी विस्मृत नहीं हों।

मीरा कुमार और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर कांग्रेस का दृष्टिकोण चाहे जो भी हो लेकिन पार्टी ने संसदीय राजनीति में मील का पत्थर तो स्थापित किया ही है। अब पार्टी को चाहिए की वह महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाकर एक और मील का पत्थर स्थापित करे और लोकतंत्र को शुभ संकेत दे। इस बार लालू और मुलायम का दबाव भी नहीं है। इन्होनें तो मंडल की मलाई खूब खाई लेकिन बराबरी की बात पर फटाक से उल्टी कर देते हैं। खैर! जनता ने जिस भाव से प्रेरित होकर जनादेश दिया है उसका सकारात्मक उत्तर देना कांग्रेस का कर्तव्य होना चाहिए। मीरा कुमार के बहाने एक शुभ संकेत तो मिल ही चुका है, कांग्रेस को कोशिश करनी चाहिए की मीरा कुमार एक प्रयोग मात्र बनकर न रह जाएँ बल्कि उनकी तरह और परिणाम सामने आएं। प्रयोग परिणाम की सीढ़ी होनी चाहिए एक छलावा नहीं।

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

शन्नो की आकृति

बाल कल्याण मंत्री 'रेणुका चौधरी' ने भले ही यह कह दिया की 'शन्नो और आकृति के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया गया है। राष्ट्र के निर्माण में हर बच्चा एक इकाई की तरह है'। लेकिन कुछ सवाल हैं जो उनकी इस बात के विरोध में दिखाई देते हैं। एक सवाल यह भी उठना चाहिए की क्या सचमुच एक झुग्गी में रहने वाले, सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले और एक पॉश इलाके में रहने वाले और अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे में सचमुच कोई भेदभाव नहीं होता है?

बहरहाल, शन्नो और आकृति दोनों ही लड़कियाँ स्कूल के दोषपूर्ण रवैए के कारण अब इस दुनिया में नहीं हैं। शन्नो भवाना के एमसीडी स्कूल की दूसरी क्लास में पढ़ने वाली ११ वर्षीया छात्रा थी, जो कड़ी धूप में मुर्गा बनाए जाने के कारण कोमा में चली गयी थी और उसके बाद उसकी मौत हो गयी। वहीँ आकृति भाटिया वसंत कुंज के माडर्न स्कूल में बारहवीं की छात्रा थी जो अस्थमा की मरीज थी। सही समय पर चिकित्सा की सुविधा नहीं मिलने पर उसकी मौत हुई। दोनों ही जगहों पर स्कूल की खामियाँ दो मौतों के रूप में उजागर हुई।

अब फिर से हम अपने सवाल पर आते हैं। शन्नो की मौत पंद्रह अप्रैल को हुई। अगले ही दिन स्कूल की अध्यापिका को निकाल दिया गया। आकृति की मौत इक्कीस अप्रैल को हुई और उसके बाद क्या हुआ सबको पता है। शन्नो की मौत के दस दिनों बाद तक रेणुका जी कुछ नहीं बोलती हैं लेकिन आकृति की मौत के बाद महज तीन-चार दिनों के भीतर ही वो क्यों सबके सामने आकर बोलती हैं? इक्कीस अप्रैल के बाद चार दिनों के भीतर ही वो पच्चीस अप्रैल को प्रेस कांफ्रेंस करती हैं। शन्नो की मौत के दस दिनों तक वो कहाँ थी? वही आकृति की मौत के बाद उनका बयान महज तीन से चार दिनों के भीतर आ गया। क्यों? सवाल यह है की अगर शन्नो के बाद आकृति की मौत नहीं हुई होती तो भी क्या रेणुका जी प्रेस कांफ्रेंस करतीं? निश्चित तौर पर आकृति की मौत के बाद उसके माँ-बाप के प्रभाव के चलते उन्हें जवाब देना पड़ा होगा। तो क्या एक गरीब छात्रा की मौत पर उनको वैसा दुःख नहीं हुआ जैसा की आकृति की मौत पर, जिसका उन्हें सरेआम इज़हार तक करना पड़ा। शन्नो की मौत के महज कुछ दिनों के भीतर हुई आकृति की मौत ने निश्चित रूप से एक उत्प्रेरक का काम किया। जो मामला ठंढा पड़ता जा रहा था और जिसपर बाल कल्याण मंत्रालय ने कोई बयान नहीं दिया उसे इसके लिए मजबूर होना पड़ा।

अब भले ही रेणुका जी जो चाहे कह ले लेकिन अमीर बनाम गरीब का सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है। एमसीडी के स्कूल अभी भी उपेक्षा के ही पात्र हैं। अभी दिल्ली में चल रहा ताज़ातरीन मामला ही देखिए। पूर्वी दिल्ली के विनोद नगर, कड़कड़डूमा आदि इलाकों से सैकड़ो बच्चे गायब होते जा रहें हैं परन्तु सरकार को शायद कोई परवाह नहीं है। बाल कल्याण मंत्रालय भी चुप्पी साधे हुए है। पुलिस तो यहाँ तक कह देती है की मामला प्रेम प्रसंग या घर से भागने का है। गौरतलब है की इसमें पांच से आठ साल के बच्चे भी शामिल हैं। अब पुलिस से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाता की आठ साल का बच्चा कैसे प्रेम प्रसंग करेगा? निठारी काण्ड को ही लीजिए। पुलिस और प्रशासन ने कई सालों तक मामले पर ध्यान नहीं दिया था जिसकी परिणति कैसी हुई सबके सामने है। वहीँ कुछ साल पहले नॉएडा में एक बड़े कंपनी के सीईओ के बेटे का अपहरण हुआ था तो कैसे पुलिस और प्रशासन हरकत में आ गयी थी। कुछ ही दिनों के भीतर उन्होंने मामला सुलझा भी लिया था। तो फिर ये मामले क्यों अधूरे पड़े हैं? क्या प्रशासन इन्हे सचमुच सुलझा नहीं पा रही है या इससे उन्हें कोई खास मतलब नहीं है? कारण वही की झुग्गियों में रहने वाले बच्चों की कोई औकात नहीं होती? उनकी परवाह किसी को भी नहीं है।

अमीर बनाम गरीब का सवाल हमेशा से रहा है और शायद अभी ख़त्म भी नहीं होने वाला है। अब रेणुका चौधरी भले ही इससे इंकार कर ले लेकिन सच्चाई उन्हें भी पता है। शन्नो और आकृति भले ही इस दुनिया में नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने एक बार फिर से इस समाज की दुखती रग पर हाथ रख दिया है जिसे छूने से शायद कई बुद्धिजीवी भी घबरातें हैं।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

जिम्मेवार कौन?

दूसरे चरण के मतदान के ठीक एक दिन पहले झारखण्ड में माओवादियों ने फिर एक बड़ी घटना को अंजाम दिया. बरवाडीह से मुगलसराए के बीच चलने वाली बीडीएम पैसेंजर गाड़ी को लातेहार के पास चार घंटे तक अपने कब्जे में रखा जिसमे अनुमानतः ७०० यात्री सवार थे. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब २००६ में इसी ट्रेन को माओवादियों ने अपने कब्जे में रखा था. गनीमत यह रही की दोनों बार उन्होंने बिना किसी को नुकसान पहुचाए ट्रेन को छोड़ दिया।

झारखण्ड में नक्सली हिंसा कोई नई बात नहीं है. परन्तु क्या कारण है कि चुनाओं के दौरान उसका वीभत्स रूप उभरकर सामने आता है? जब तक २५-५० जवान कुर्बान नहीं हों, दो-चार बारूदी सुरंग न फटें तबतक यहाँ चुनाव नहीं हो पाते. सरकार चाहकर भी(?) क्यों नहीं कुछ कर पाती? आप किसी भी ज़िले में घूम लीजिए, हर जगह चुनाव बहिष्कार के पोस्टर दिख जायेंगे.

पिछड़ों कि राजनीति कर अब अपने ही स्वार्थ में लीन हो चुके नक्सलियों को यह मंजूर नहीं कि सरकार उनके अस्तित्व को नकारे. जब भी ऐसी कोशिश हुई है उन्होंने अपनी उपस्थिति का अहसास कराया है. सरकार के प्रति उनका असंतोष जगजाहिर है परन्तु कारण बहुत हद तक धुंधले पड़ चुके हैं. सत्ता और वर्ग संघर्ष का यह खेल अदभुत है. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब बीजापुर के घने जंगलों में तहलका के 'अजीत साही' के साथ हुए इंटरव्यू में नक्सली नेता 'रेंगम' ने इस बात को स्वीकारा है कि हम अपनी सरकार चाहते हैं. आखिरकार झारखण्ड में नक्सलियों के इस बढ़ते वर्चस्व का कारण क्या है?

सबसे पहली बात तो जिन संसाधनों और आदिवासियों के कल्याण के लिए अलग झारखण्ड राज्य की स्थापना हुई थी आज वही सन्दर्भ गायब हो चुका है. आदिवासियों के कल्याण के लिए बने शिक्षा, रोजगार की योजनाएं दम तोड़ रही हैं. वे आज भी अत्यंत गरीब, अशिक्षित और बेरोजगार हैं. उनका भरपूर दोहन किया जाता है. जहाँ १२५ रुपये दैनिक मजदूरी का प्रावधान है वही पाकुड़ ज़िले के कई संथाली मात्र ७०-८0 रुपये पर मजदूरी करते हैं. सरकार ने इनकी कितनी ही जमीन कारपोरेट घरानों को दे दी है. एक अनुमान के मुताबिक यहाँ लगभग सौ उद्योग लगने वाले हैं जो आदिवासियों के विद्रोह के कारण फिलहाल ठंढे बस्ते में हैं. अगर प्रमाण चाहिए तो आप पाकुड़, दुमका, गोड्डा आदि ज़िलों का भ्रमण कर लीजिए. सरकार का भेदभावपूर्ण रवैया, ग्रामीणों का असंतोष और उनकी निरक्षरता माओवादियों के सफलतम हथियार हैं.

एक अन्य कारण है इस राज्य की भौगोलिक बनावट जिसके बारे में ज्यादा बताने की जरुरत नहीं है.
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कारण राजनैतिक है. अपने नौ साल की छोटी सी जीवन अवधि में झारखण्ड की राजनीति काफ़ी अस्थिर रही है. नेताओं ने निजी स्वार्थ के लिए संसाधनों का भरपूर दोहन किया है. आदर्श राज्य बनाने की बात कोरी बकवास साबित हुई है. नक्सली खुलेआम हर निर्माण कार्य पर, खदानों से, पैसे वालों से लेवी लेते हैं जिसे सरकार रोक नहीं पाती. सबसे बड़ी बात कि कई नेता ऐसे हैं जिनकी नक्सलियों से सीधी सांठ-गाँठ है. ताजा उदाहरण ही लीजिए- झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने पलामू संसदीय सीट से कामेश्वर बैठा को अपना उम्मीदवार बनाया है. ये वही 'बैठा' हैं जो चन्द साल पहले गढ़वा, पलामू, कैमूर आदि ज़िलों के ज़ोनल कमांडर रह चुके हैं. जिनके नाम से लोग कांपते थे. जहाँ सरकार और नक्सलियों में अंतर्विरोध महज एक दिखावा हो वहां ऐसे हालात तो बनेंगे ही.

कुछ समय कि घटनाओं से, जो बना बनाया विश्वास था कि नक्सली आम लोगों को नहीं मारते वो अब टूट चुका है. कहीं १९८७ कि वो याद फिर से न ताज़ा हो जाये जब आंध्र प्रदेश में पीपुल्स वार ग्रुप के महासचिव 'सीतारमैया' ने पांच विधायकों का अपहरण कर लिया था और कहा था कि " ज़रूरत पड़ी तो राजीव गाँधी को भी अगवा किया जा सकता है". इस बार भी भले ही उन्होंने बिना किसी को नुकसान पहुचाए ट्रेन को छोड़ दिया लेकिन सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है कि इन सबका " जिम्मेवार कौन?"

रविवार, 19 अप्रैल 2009

लोकतंत्र में 'जूता'

कहते हैं जब आदमी हर जगह से निराश हो जाता है तो भगवान को याद करता है। उनसे मदद मांगता है न मिलने पर उन्ही को कोसता भी है। लेकिन अब लोगों ने भगवान को छोड़कर जूते का सहारा ले लिया है। चारों तरफ दनादन जूते बरसें, अभी बरस रहे हैं, और मौसम देखकर लग रहा है की बरसते ही रहेंगे। इसके संस्थापक या कहे की पितामह का दर्ज़ा
मुन्तज़र-अल-ज़ैदी
को दिया जाना चाहिए जिन्होंने पहली बार में ही ऐसा बेंचमार्क स्थापित किया की दुनिया दंग रह गयी। पहले तो लोग भौच्चके रह गए परन्तु हमेशा की तरह इस मीडिया प्रयोग को भी अपना लिया। फिर क्या था, 'बेन जिआबाओ, अरुंधती रॉय, पी. चिदंबरम और अब आडवानी' भी इस नए प्रयोग के दायरे में आ गए।

जूते के इन प्रकरणों से कुछ गंभीर सवाल निकलते हैं जिनपर विचार करना बहुत जरूरी है।

पहली बात यह की क्या कारण है की हर बार जूता निशाने से चूक गया? यह सवाल इसलिए भी अहम है की अगर कोई १०-२० फ़ुट की दूरी से जूता मारे और हर बार निशाना चूक जाये तो थोड़ा अटपटा सा लगता है। तो क्या इस जूता चलाने के पीछे सिर्फ सम्बंधित लोगों को आगाह मात्र करना था? वैसे हमे यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह 'पगड़ी उछालने' का अर्थ बहुत व्यापक होता है ठीक वैसे ही इस 'जूता फेंको' क्रांति का अर्थ बहुत बड़ा और गंभीर है।

सबसे पहला कारण तो निश्चित तौर पर असंतोष ही है। बुश कि इराक नीतियों से जनता आहत थी जिसका प्रतिनिधित्व मुन्तज़र-अल-ज़ैदी ने किया, अरुंधती रॉय के लेख से एक बड़ा तबका असहमत था जिसका प्रतिनिधित्व 'युवा' संगठन के एक नौजवान ने किया, सिख दंगों में न्याय नहीं मिलने से पूरा सिख समुदाय आहत था जिसका प्रतिनिधित्व जनरैल सिंह ने किया और बीजेपी पार्टी में फैले एक व्यापक असंतोष का प्रतिनिधित्व पावस अग्रवाल ने किया।

वस्तुत लोकतंत्र में फैलती गहरी असमानता, तंत्र से 'लोक' को अलग करने कि साज़िश और समाज में फैलते असुरक्षा के भाव ने लोगों को जड़ तक आहत और आक्रोशित किया है। इस आक्रोश का सैलाब मुंबई हमलों के बाद फूट पड़ा जिसका नेतृत्व भले ही खाते-पीते मध्यवर्ग ने किया परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से इसमें सबकी भागीदारी रही। लोकतंत्र का 'लोक' अब ऐसे मुहाने पर आ खड़ा है जहाँ से वो अब सिर्फ कड़े फैसले ही लेगा।

एक बात और आडवाणी पर जो जूता चला वो और मामलों से बिलकुल अलग रहा। जहाँ पार्टी ही सर्वेसर्वा हो, वहां पार्टी के ही एक कार्यकर्ता द्वारा,पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर जूता फेंकना बिल्कुल नई घटना है। पार्टी को मानने और उसकी विचारधारा को ग्रहण करने में सालों का वक़्त लगता है, फिर क्या बात रही की सालों की यह विचारधारा एक जूते के तले सिमट गयी। सवाल सचमुच बहुत गंभीर है।

'भारतीय लोकतंत्र में जूता' महज असंतोष, क्रोध और क्षोभ का ही सूचक नहीं है। यह दिखाता है की जब लोकतंत्र के पहरेदार, 'लोक' को भूलकर, केवल सूने तंत्र की बात करेंगे तो लोक को आखिरकार संकेतों के रूप में जूते ही चलाने पड़ेंगे। ये शायद सीधे-सीधे नहीं लगेंगे लेकिन मीडिया कवरेज से ऐसी मारक क्षमता विकसित करेंगे जिसकी अनुगूँज हर कोने में सुनाई देगी।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

मीडिया- अपने ही घेरे में (१)

अगर लोगों से पूछा जाए की ओबामा के कुत्ते का नाम क्या है या कि अभी कौन सी हिरोइन ज्यादा चर्चा में है तो इन सवालों के जवाब देने के लिए शायद ही उन्हें सोचना पड़े। लेकिन सवाल को थोड़ा टेढ़ा कर दिया जाये, मसलन, अभी लैटिन अमेरिका में क्या हो रहा है या श्रीलंका की वर्तमान स्थिति क्या है तो लोग सर खुजाने लगेंगे। इस बात के लिए शायद लोग उतने जिम्मेवार नहीं हैं जितना कि मीडिया। लोगों को जो बात दिखाई जायेगी उन्हें वही बात याद रहेगी। कारण शायद वही है कि 'बो(ओबामा का कुत्ता)' और राखी सावंत के सामने लैटिन अमेरिका या श्रीलंका उतनी टीआरपी नहीं दे पाएंगे।

आज जब हर चीज़ पर आत्मचिंतन हो रहा है तो मीडिया को इससे अलग क्यों किया जाए? आज के इस दौर में जब ख़बर देने वाले ख़बर बनाने लगे हैं तो उनके चरित्र का मूल्यांकन क्यों न हो? पत्रकारिता के मिशन कि बात आउटडाटेड हो चुकी है, यह सच्चाई सभी लोग मान चुके हैं, परन्तु बची-खुची शर्म-हया और सामाजिक सरोकार को यूँ ही घोलकर पी जाना कहाँ कि बुद्धिमानी है?

आज मीडिया ज्यादा शक्तिशाली हो चुका है, लेकिन शक्ति के गरूर में वो यह बात भूलता जा रहा है कि " Great Power Comes With Great Responsibilities"।

श्रीलंका में सेना ने लिट्टे के खिलाफ़ फिर से मोर्चा खोल दिया है। हाल में वहां सेना और लिट्टे के संघर्ष में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. इसमें ज्यादातर निर्दोष ही शामिल हैं. यहाँ पर सवाल यह है कि इस खूनी लड़ाई कि सही तस्वीर कितने लोगों तक पहुची है? हमारे चैनलों और प्रिंट मीडिया ने इस संघर्ष कि कितनी जानकारी दी है? शायद कम ही लोग यह जानते होंगे कि वहां पर कई बच्चों के सर उड़ा दिए गये हैं, कारण सिर्फ इतना था कि वो तमिल बोलते थे. एक महिला को उसके ८ साल के गर्भ के साथ मार दिया गया. क्यों? सरकार और सेना सभी तमिलों को लिट्टे का समर्थक मान चुकी है. यह सच्चाई क्या सबको पता है? इस घटना कि कई वीभत्स तस्वीरें मीडिया में छुपाई गयीं हैं. लगभग २०,००० से ज्यादा नागरिक युद्ध में फंसे हुए हैं और बेघर हैं. आखिर क्यों? समुदाय के नाम पर हिटलर की गाथा को दुहराया जा रहा है और लोग इससे बेखबर हैं।

हमारी मीडिया ने इक्का-दुक्का ख़बरों को चलाकर अपने काम कि इत्तिश्री मान ली। संभवत श्रीलंकन सरकार पत्रकारों को अन्दर तक जाने कि इजाज़त नहीं दे रही, लेकिन सवाल यह है कि कहाँ गए वो खोजी पत्रकार जो कभी अपनी जान पर खेलकर खबरें लाते थे? क्या मीडिया अब अपने ही बनाए घेरे में कैद हो चुकी है? यहाँ मै एक चीज़ कहना चाहता हूँ कि जिस अरुंधती रॉय पर कश्मीर के खिलाफ़ लिखने पर जूता चलाया गया उन्होंने निश्चित तौर पर इस मामले में बहुत अच्छी रिपोर्टिंग की है।

मीडिया ने सच्चाई को दरकिनार कर फ़ालतू की खबरें दिखाईं थी, मसलन, तमिलनाडु में इस मुद्दे से फैले असंतोष, सरकार गिराने की धमकी आदि। ख़बरों को छिपाने के लिए वही हथकंडा अपनाया गया जो तहलका काण्ड के समय किया गया था। दरअसल आज मीडिया अपने लिए तय न्यूनतम पैमाने से भी नीचे जा गिरा है। सामाजिक सरोकार और जनहित की बात आज टीआरपी के विशाल बरगद के नीचे खड़े उस छोटे पौधे के समान है जिसका आस्तित्व बरगद के सामने बौना हो जाता है।


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सोमवार, 6 अप्रैल 2009

राजनीति बनाम सामाजिक कार्यकर्ता

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले की मानवाधिकार कार्यकर्ता रोमा मलिक ने वरुण गाँधी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाए जाने का समर्थन किया है। रोमा मलिक सन् २००० से एक संस्था चला रही हैं जिसका नाम है- नेशनल फोरम ऑफ़ फॉरेस्ट पीपुल एंड फॉरेस्ट वोर्केर्स। इनकी संस्था का काम है लोगो में राजनितिक समझ को पैदा कर समाज में होने वाले भ्रष्टाचार को ख़त्म करना। बहरहाल, वरुण गाँधी पर यह कानून लगाया जाना उचित है या नहीं इसपर राजनीतिक विद्वान् पहले ही काफी टिपण्णी कर चुके हैं। यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के दृष्टिकोण में भी वरुण पर लगा यह प्रतिबन्ध सही है।

अगर हम सिर्फ रोमा जी के समर्थन की बात करें तो मामला सिर्फ दृष्टिकोण और अपने नज़रिए को प्रस्तुत करने जैसा प्रतीत होता है। यह सही है की कोई भी व्यक्ति समाज में अपनी निजी राय प्रस्तुत कर सकता है। परन्तु अगर उनके तर्क पर गौर किया जाये तो कुछ प्रश्न निकलकर सामने आते हैं। सबसे पहले उनका तर्क देखिए-
" वरुण पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाए जाने का मैं समर्थन करती हूँ। बीजेपी के नेताओं को ऐसे कड़े कानूनों का पता चलना चाहिए जिसका वे समर्थन करते हैं। छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को ऐसे ही कानूनों के तहत लम्बे समय से जेल में रखा गया है। अब वरुण गाँधी पर जब रासुका लगा तो बीजेपी नेता घड़ियाली आंसू क्यों बहा रहे हैं?"

पहली नज़र में यह बयान किसी राजनीतिक पार्टी का लगता है। परन्तु एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने ऐसा बयान दिया है, सोचने लायक है। अब यहाँ ये प्रश्न उठते हैं कि कोई भी समाज एक मानवाधिकार कार्यकर्ता से क्या उम्मीदें कर सकता है? क्या वह कार्यकर्ता सिर्फ मनुष्यता के नाते लोगों के अधिकारों की बात करता है या वह पूर्वाग्रह ग्रसित भी होता है? सामाजिक द्वन्द और तेजी से बढ़ते मानवाधिकार हनन के इस दौर में क्या हम इनसे ज्यादा की अपेक्षा कर बैठे हैं? और एक यक्ष प्रश्न की, क्या ये कार्यकर्ता सिर्फ समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए ही मानवाधिकारों की दुहाई देते फिरते हैं? इन प्रश्नों पर विचार करना अब जरुरी हो गया है।

छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने विनायक सेन के साथ जो किया है वो बहुत दुखद और निंदनीय है। शायद ही कोई बीजेपी के इस कारगुजारी को सही कहेगा। परन्तु क्या रोमा जी सिर्फ इसी आधार पर, वरुण गाँधी के साथ हुए अन्याय को सही ठहरा सकती हैं? हो सकता है बीजेपी के लिए उनके मन में गहरा क्रोध हो और वो सही भी हो सकता है, परन्तु उसी पैमाने पर सभी चीजों को तौलना सही है? एक पार्टी के आधार पर उसके कार्यकर्ता के साथ हुए अन्याय को सही कहना बिलकुल ठीक नहीं है। मानवाधिकारों के हनन का फैसला मनुष्यता के आधार पर होता है, पार्टी के आधार पर नहीं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें की रोमा जी पर भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा हुआ है। अपने साथ हुए अन्याय को देखकर भी वो अन्याय को समझ नहीं पा रहीं हैं।

रोमा जी को यह बताना चाहिए की वो मानवाधिकारों की जो लडाई लड़ रही हैं क्या उसके लिए सिर्फ़ मानव भर होना जरुरी नहीं है? या फिर किसी के आधिकारों को दिलाने के लिए वो उसकी पार्टी,धर्म आदि चीजों को भी देखती हैं। वरुण गाँधी ने जो कहा गलत था और रासुका लगाना उससे भी गलत। रोमा जी को भी यह जानना चाहिए की बतौर एक सामाजिक कार्यकर्ता, उनके लिए वरुण पहले एक आम इंसान हैं बीजेपी के उम्मीदवार बाद में।